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असंगठित क्षेत्र : नीतिगत मुद्दे व सुधार – Exam Guider

असंगठित क्षेत्र : नीतिगत मुद्दे व सुधार

असंगठित क्षेत्र : नीतिगत मुद्दे सुधार

2011 की जनगणना के आंकड़ों तथा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 2017-18 के आंकड़ों के अनुसार भारत का लगभग 93 प्रतिशत कार्यबल अनौपचारिक रूप से नियोजित है। ये असंगठित कामगार मुख्य रूप से औपचारिक फर्मों या संस्थानों के बाहर, गैर-निगमित निजी उद्यमों में काम करते हैं और उन्हें किसी प्रकार का सामाजिक सुरक्षा का लाभ प्राप्त नहीं है।

असंगठित क्षेत्र को संगठित करने की आवश्यकता

सरकार के लिए अनौपचारिक क्षेत्र से कर राजस्व बढ़ाने, डेटा एकत्र करने और फर्मोँ को विनियमित करना चुनौतीपूर्ण है। इसके अलावा अनौपचारिक क्षेत्र के कारण भारत की कर एवं सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात अपेक्षा अनुरूप नहीं है, जिससे शिक्षा एवं स्वास्थ्य देखभाल प्रभावित होता है। ০ औपचारिकरण, स्वतंत्र रूप से काम करने वाले व्यक्तियों औरफर्मों को लाभ तथा उत्पादकता प्राप्त करने में मदद करेगा।

इससे सरकार को अधिक राजस्व प्राप्त होगा तथा जीडीपी की अनुपात में कर संग्रह बढ़ेगा जिससे सामाजिक क्षेत्र में अधिक निवेश हो सकता है। औपचारिक अर्थव्यवस्था, कानून के शासन और नागरिकों, उद्यमियों एवं श्रमिकों के बीच अधिकारों की समानता स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।

औपचारीकरण के लिए उठाए गए नवीनतम कदम

जुलाई 2019 में केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने लघु व मध्यम उद्योग के लिए ई कॉमर्स वेबसाइट (Bharatcraft Portal) की शुरुआत की है जिससे उन्हें अपने उत्पादों के विपणन में मदद मिलेगी।

भारत क्राफ्ट अक्टूबर 2018 में ईपीएफ (EPF) की सीमा को 21,000 रुपये से घटाकर 15,000 रुपये कर दिया गया। स्टार्टअप उद्यम की संख्या में वृद्धि के कारण जनवरी 2019 में ईएसआईसी (ESIC) को 4% से घटाकर 3.3% कर दिया गया। 5 लाख तक की आय (इसमें 60%-65% कार्यबल शामिल हैं) वालों को आयकर से मुक्त किया गया है। जीएसटी एवं विमुद्रीकरण ने छोटे एवं लघु उद्यम को प्राधिकरण के अंतर्गत पंजीकरण करना अनिवार्य कर दिया जिसके परिणामस्वरूप वे सामाजिक सुरक्षा जैसे ईपीएफ को अपनाने के लिए विवश हुए हैं।

चुनौतियां

कार्य का समय निश्चित नहीं– संगठित क्षेत्र की तुलना में असंगठित क्षेत्र में कार्य का समय निश्चत नहीं है तथा दूसरी कई सुविधाओं जैसे सुरक्षित कार्यस्थल का अभाव है।

भेदभाव का सामना– असंगठित क्षेत्र में कार्यरत कामगारों में शिक्षा का अभाव होता है और उन्हें कम पारिश्रमिक एवं लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

नियोक्ता की पहचान – इस क्षेत्र में ठेके पर काम करने वाले कामगारों के नियोक्ता की पहचान नहीं हो पाती है, जिससे उन्हें किसी दुर्घटना के समय मुआवजा उपलब्ध करवाना मुश्किल होता है।

अनियमित रोजगार – अनुबंध के आधार पर कार्य करने के कारण अधिकांश कामगारों को सुरक्षित एवं नियमित रोजगार उपलब्ध नहीं होता है।

प्रभावी संघ का अभाव– असंगठित क्षेत्र के हितों की रक्षा के लिए सरकार पर दबाव डालने वाले प्रभावी संघ का अभाव है। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र के लिए बने कानून या प्रावधानों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नियामक की कमी है।

अस्थायी नियुक्तिः विनिर्माण क्षेत्रों में सामान्यत कामगारों को अस्थाई रूप से नियुक्त किया जाता है जो मंदी होने पर सबसे पहले प्रभावित होते हैं।

रोजगार सुरक्षा: प्रौद्योगिकी आधारित स्टार्टअप कंपनियां कई संचालित उद्योग स्थापित कर रही हैं जिससे अकुशल कामगारों के रोजगार कम हो रहे हैं, उदाहरण के लिए CCTV आधारित सुरक्षा सेवा तकनीक ने सुरक्षा गार्ड के कार्य को कम किया है।

आरक्षित उत्पादों में कटौती

केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम 1951 की धारा 29B(2C) के अंतर्गत गठित सलाहकार समिति, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए आरक्षित उत्पादों / वस्तुओं का समय-समय पर मूल्यांकन करती है। भारत ने 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए आरक्षित कई उत्पादों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था। 1991 में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्षेत्र द्वारा निर्माण के लिए 800 वस्तुएँ आरक्षित थी जिसमें समय-समय पर कटौती की गयी और मई 2019 ऐसी वस्तुओं को संख्या घटकर केवल 20 रह गई हैं। बजट 2019-2020 के अनुसार आतिशबाजी वाले पटाखे, माचिश, प्रेड, लकड़ी एवं स्टील के फर्नीचर तथा अगरबत्तियां उन 20 वस्तुओं में से हैं, जो अब केवल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों द्वारा विशेष रूप से उत्पादित नहीं की जाएंगी । सरकार की इस नौति से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को इन वस्तुओं के उत्पादन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद से चुनौती मिलेगी और इस क्षेत्र में कार्यरत अकुशल कामगारों के रोजगार भी प्रभावित हो सकते हैं।

संक्ष्म लघु वे मध्यम उद्योग के मुद्दे

अनुबंधित रोजगार: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) द्वारा जारी तिमाही बुलेटिन के अनुसार दिसंबर 2018 में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों में अधिकांश कामगार अनुबंध पर या अस्थायी रूप से काम करते हैं। चीन की तुलना में कम भागीदारी तुलनात्मक रूप से देखें तो जहां चन के लघु-मध्यम आकार के उद्यम उसके कुल औद्योगिक उत्पादन में 60% का योगदान करते हैं वहीं भारत उत्पादन में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की भागीदारी 45% ही है। भारत का 40% कार्यबल एसएमई में काम करता है जो चीन । की तुलना में 8 प्रतिशत कम है।

व्यावसायिक जोखिम एवं स्वास्थ्य के मुद्दे

प्रतिकूल परिस्थितिः असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों को प्रतिकूल परिस्थिति जैसे अत्यधिक गर्मी या लगातार खड़े होकर काम करना पड़ता है जिससे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है।निरंतर शारीरिक श्रम स्वास्थ्य समस्याओं के साथ निरंतर शारीरिक श्रम के कारण असंगठित श्रमिकों को कई जोखिम का सामना करना पड़ता है सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा स्वास्थ्य देखभाल के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा संसाधनों की कमी भी बड़ा मुद्दा है।

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संवैधानिक प्रावधान
1.अनुच्छेद 23 व 24: कारखाना एवं खानों या जोखिम व्यवसायों में जबरन श्रम या बाल श्रम का प्रतिबंधित किया गया

2. अनुच्छेद 15 तथा 16: यह अनुच्छेद राज्य द्वारा गैर भेदभावऔर सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता गारंटी देता है।
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अनौपचारिक क्षेत्र में सुधार के प्रयास

औपचारीकरण
2014 में गठित केंद्र सरकार द्वारा औपचारिक या असंगठित क्षेत्र को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कई नीतियाँ बनाई गयी हैं। भारतीय स्टाफिंग फेडरेशन (India. Staffing Federation) के अनुसार 2015 से 2018 के बीच टेन मिलियन से अधिक नौकरियों को औपचारिक रूप दिया गया है।

नई नीतियाँ:

रोजगार को औपचारिक रूप देने के लिए माल एवं सेवा कर, विमुद्रीकरण, ईपीएफ (EPF) सुधार, कौशल भारत पहल, निश्चित अवधि वाले अनुबंध सुधार और मातृत्व लाभ सुधार जैसी नीतियाँ शुरू की गयी हैं।

 2015-18 में औपचारिक क्षेत्र में स्थानांतरित हुई सात मिलियन नौकरियों में ईपीएफ सुधारों ने 18.16 प्रतिशत, इंएसआईसी (ESIC) ने 17.68 प्रतिशत, जीएसटी (GST) ने 15.32 प्रतिशत, स्किल इंडिया (Skill India) ने 13.10 प्रतिशत, विमुद्रीकरण (demonetisation) ने 12.35 प्रतिशत तथा मातृत्व लाभ सुधार ने 11.83 प्रतिशत और निर्धारित अवधि वाले अनुबंध ने 11.56 प्रतिशत का योगदान दिया। 2018 और 2021 के बीच लगभग 11 मिलियन रोजगार को औपचारिक क्षेत्र के अंतर्गत शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजना

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण के लिए ‘असंगठित श्रामिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008’ (Unorganised Workers Social Security Act, 2008) लागू किया गया था। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन किया गया।

असंगठित श्रमिकों को विकलांगता मुआवजा, स्वास्थ्य एवं मातृत्व लाभ, वृद्धावस्था सुरक्षा तथा सरकार द्वारा निर्धारित अन्य लाभ उपलब्ध करवाने के लिए काम करती है।

उदाहरण के लिए 15 फरवरी 2019 से असंगठित क्षेत्र के 40 वर्ष तक के सभी श्रमिकों के लिए प्रधानमंत्री श्रम योगी मानव (Pradhan Mantri Shram Yogi Maandhan) की गयी है। इस योजना के अंतर्गत श्रमिक 3.000 रुपये न्यूनतम मासिक पेंशन योजना ले सकते हैं।

अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र क्या है?

असंगठित क्षेत्र:
असंगठित क्षेत्र वैसे फर्मों या कंपनिया संदर्भित करता है जो किसी कानूनी प्रावधान या सामूहिक समझोते श्रमिकों को नियुक्त तथा नियंत्रित करते हैं । इसके अंतर्गत वर ही किए जाने वाले कार्य, स्व-रोजगार कषि कार्य, निर्माण का तथा कई दूसरे अस्थायी कार्य भी शामिल हैं।

अनौपचारिक क्षेत्र:
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (International Labour Organisation ILO) RI4 अवधि वाले तथा अपंजीकृत आर्थिक गतिविधियों की पहचान के लिए 1972 में अनौपचारिक क्षेत्र (Informal sector) टर्म (term) का प्रयोग किया गया था। भारतीय संदर्भ में इंडियन नेशनल अकाउंट स्टैटिस्टिक द्वारा असंगठित क्षेत्र (unorganised sector) टर्म का उपयोग किया है। जाता इस प्रकार भारत में अनौपचारिक क्षेत्र तथा असंगठित क्षेत्र का उपयोग समान अ्थों में किया जाता है। हालांकि, आईएलओ के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र में गैर कृषि क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में अनियमित एवं अनौपचारिक रूप से कार्यरत कामगार को शामिल किया जाता है।

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अर्जुन सेनगुप्ता समिति की परिभाषा
जनवरी 2005 में भारत सरकार ने असंगठित क्षेत्र के कामगारों की स्थिति में सुधार के लिए अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता में ‘नेशनल कमीशन फॉर एंटरप्राइजेज इन दअनऑरगेनाइन्ड सेक्टर’ (National Commission for Enterprises in the Unor-ganisedSector) गठित की थी। इस कमीशन ने जुलाई 2007 में अपनी रिपोर्ट पेश की। * रिपोर्ट के अनुसार मुख्य रूप से पूरे वर्ष एक समान आय न पाने वाले व्यक्ति को असंगठित क्षेत्र में कार्यरत माना गया है और कृषि क्षेत्र को भी इसके अंतर्गत शामिल किया गया है।
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असंगठित क्षेत्र का वर्गीकरण

अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने असंगठित क्षेत्र को 4 भागों में बांटा है-
1. दैनिक मजदूर: नियोक्ताओं या एजेंसियों या ठेकेदारों द्वारा कामगार को प्रतिदिन के आधार पर मजदूरी दी जाती है जिन्हें दिहाड़ी मजदूर कहा जाता है। दिहाड़ी मजदूरों में आकस्मिक एवं अस्थायी श्रमिक शामिल हैं।

2.स्व-नियोजित कामगारः व्यक्तिगत रूप से या परिवार के सदस्यों के साथ कृषि या गैर-कृषि उद्यम संचालित करने वाले व्यक्ति को स्व-नियोजित कामगार माना जाता है।

3. संगठित क्षेत्र में अस्थायी श्रमिकः ऐसे कामगार जो संगठित क्षेत्र में मुख्य रूप से नियमित, आकस्मिक तथा अनुबंध के आधार पर कार्यरत हैं लेकिन उन्हें कंपनी कानूनों के प्रावधानों का लाभ नहीं मिलता है और उन्हें स्थायी नियुक्ति नहीं मिलती है।

4. नियमित असंगठित श्रमिकः ऐसे श्रमिक जो अनुबंध या ठेकें के आधार पर दूसरों के लिए काम करते हैं और नियमित आधार पर वेतन या मजदूरी प्राप्त कर रहे हैं, उन्हें नियमित असंगठित श्रमिक कहा जाता है। इन श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा जैसे पेंशन या ईपीएफ की सुविधा नहीं मिलती है।

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