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उमीदवारों की शैक्षाणिक योग्यता और मतदाताओं के मौलिक अधिकार – Exam Guider

उमीदवारों की शैक्षाणिक योग्यता और मतदाताओं के मौलिक अधिकार

उमीदवारों की शैक्षाणिक योग्यता और मतदाताओं के मौलिक अधिकार

नवंबर को उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल दवे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की खंडपीठ ने व्यवस्था दी है। कि चुनावों में यदि किसी उम्मीदवार ने अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में कोई गलत जानकारी दी है तो उसकी उम्मीदवारी रद्द हो सकती है। न्यायालय ने इस मामले में अपने फैसले में कहा है कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 (Represen- tation of the People Act 1951) के प्रावधानों और फार्म 26 के तहत यह उम्मीदवार का कर्तव्य है कि वह अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में सही जानकारी प्रदान करे। जाहिर है, इस नियम के बाद भी अगर किसी आवेदन या दस्तावेज में गलत सूचना दर्ज की जाती है तो उसकी। जिम्मेदारी उम्मीदवार पर ही आना स्वाभाविक है। यह इसलिए भी कि अगर कोई व्यक्ति विधायिका का हिस्सा होने जा रहा है तो उसे सबसे पहले अपने लिए तय किए गए नियम-कायदों।के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए और उस पर ईमानदारी से अमल करना वह खुद अनिवार्य मानता हो। उल्लेखनीय कि संसद या विधानमंडलों के चुनावों में उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता और डिग्री पर विवाद की स्थिति में पिछले काफी समय से उलझन कायम थी। अब इस मसले पर उच्चत्तम न्यायालय ने जो व्यवस्था दी है उससे स्पष्टता आएगी।

उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता जैसे मामलों पर प्रश्न उठाने वाले आमतौर पर प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार ही होते थे। इस लिहाज से देखें तो न्यायालय के इस फेसले का एक अहम पहलू यह है कि उसने उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मांगने को मतदाताओं के मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज किया है। यानी अगर कोई मतदाता उम्मीदवार की डिग्रियों के बारे में सूचना चाहता है तो उसे मुहैया कराना उम्मीदवार के लिए कानूनी बाध्यता होगी। ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं जिसमें किसी व्यक्ति ने विधायिका में अपनी उम्मीदवारी के लिए आवेदन भरते शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत सूचना दर्ज कर दी। ऐसी सूचना की तत्काल पुष्टि हो सके, इसकी व्यवस्था अब तक कमजोर रही है। इसलिए ऐसे लोग नामांकन, मतदान, चुनाव और जीत की प्रक्रिया को पार कर विधायिका का हिस्सा भी बन जाते हैं। मुश्किल तब सामने खड़ी होती है जब किसी तरह का शक होने पर विपक्ष से या कोई और उम्मीदवार जीत गए व्यक्ति की ओर से दी गई सूचना पर सवाल उठा देता है।

कुछ समय पूर्व दिल्ली में आम आदमी पार्टी को सरकार में कानून मंत्री रहे जितेंद्र तोमर की स्नातक और कानून की डिग्रियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तब स्वाभाविक ही यह सवाल उठा कि जो व्यक्ति गलत सूचना के आधार पर विधायक बन जाता है, वह एक स्वच्छ और इमानदार शासन की कसौटी पर कितना खरा उतर सकेगा!

इसके अलावा, हाल में मौजूदा केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रही और अब कपड़ा मंत्री रहीं स्मृति ईरानी के ओर से भी अपनी डिग्रियो के बारे में गलत सूचना देने पर सवाल उठाते हुए अदालत में मामला पहुंचा था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने विभिन्न चुनाव लड़ने के लिए चुनाव आयोग में दाखिल हलफनामों में अपनी शक्षणिक योग्यता के बारे में गलत सूचनाएं दीं। हालांकि दिल्ली।की पटियाला हाउस कोर्ट ने देरी को आधार बना कर यह मामला खारिज कर दिया,।लेकिन डिग्री के बारे में गलत जानकारी का सवाल बना रहा। इस लिहाज से देखें तो उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले से स्थिति स्पष्ट कर दी है।कोई नागरिक चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से ईमानदार होने के साथ-साथ अपने बारे में सही जानकारी. सामने रखने की अपेक्षा करेगा। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951: चुनाव के वास्तविक।संचालन से संबंधित सभी विषय जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधनों से शासित होते हैं। इसकी प्रतिपूर्ति उस अधिनियम के अनुच्छेद 169 के तहत निर्वाचन आयोग के परामर्श से केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये निर्वाचन संचालन नियम 1961 से होती है।

इस अधिनियम तथा नियमों में चुनाव संचालन के सभी चरणों के विस्तृत प्रावधान हैं। संविधान द्वारा चुनाव अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग को प्रदान की गई हैं। निर्वाचन आयोग वैसे।मामलों से निपटने के लिए विशेष आदेश या निर्देश जारी कर सकता है, जिसके बारे में संसद द्वारा पारित कानून ने कोई प्रावधान नहीं किया है या प्रावधान अपर्याप्त है।

एक अन्य अस्पष्ट क्षेत्र है जहां संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग अपनी अंतर निहित शक्तियों का प्रयोग करता ह।।यह राजनीतिक दलों तथा निर्देशन के लिए आदर्श आचार संहिता की लागू करना है। निर्वाचन के पश्चात चुनावों से संबंधित सभी संदेहों तथा विवाद का समाधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है। इस अधिनियम के अंतर्गत ऐसे सभी संदेह और विवाद संबद्ध राज्य के उच्च न्यायालय के समक्ष केवल चुनाव समाप्ति के बाद उठाये जा सकते हैं, चुनाव प्रक्रिया जारी रहने के समय नहीं।

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