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कैमरा तथा आँख(The Camera and the Eye) – Exam Guider

कैमरा तथा आँख(The Camera and the Eye)

कैमरा तथा आँख(The Camera and the Eye)

किसी कैमरे में प्रकाश को फिल्म पर फोकस करने के लिए उत्तल लेंस का उपयोग करते है । प्रतिबिम्ब की स्पष्टता इस बात पर निर्भर करती है कि डायाफ्रम (द्वारक) कितना खुला हुआ है।

किसी कैमरे में प्रकाश को फिल्म पर फोकस करने के लिए लें स का उपयोग करते हैं। इसमें उत्तल लें स के द्वारा किसी बिम्ब का प्रतिबिम्ब फिल्म पर प्राप्त किया जाता है। कैमरे में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा का नियंत्रण लें स के पीछे लगे डायाफ्राम (द्वारक) द्वारा किया जाता है प्रतिबिम्ब की स्पष्टता इस बात पर निर्भर करती है कि डायाफ्राम कितना खुला है।

डायाफ्राम आवश्यकता से अधिक खुला होने पर प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं बनता। इसका कारण यह है कि कैमरे के लेंस के बाहरी भाग तथा केन्द्रीय भाग प्रकाश को एक ही बन्दु पर फोकस नहीं करते।

इस दोष को गोलीय विपथन (Spherical Aberration) कहते हैं। इस दोष का निवारण करने के लिए अनबिन्दुक (Anastigmatic) लेसों का उपयोग किया जाता है। अनबिन्दुक लेंस विभिन्न प्रकार के कांच के अनेक लेंसों को परस्पर जोड़कर बनाये जाते हैं। गोलीय विपथन रो उत्पन्न दोष का निवारण विशेष प्रकार से बनाये नवचंद्रक लेंसों (Meniscus Lens) का उपयोग करके भी किया जाता है।

मनुष्य की आँख भी इसी प्रकार का एक प्रकाशिक यंत्र है। इसका लेंस प्रोटीन से बने पारदर्शी पदार्थ का बना होता है । प्रतिबिम्ब लेंस के पीछे एक पर्दे पर बनता है जिसे रेटिना (दृष्टि पटल) कहते हैं। रेटिना दृक तंत्रिकाओं (Optic Nerves) द्वारा हमारे मस्तिष्क में विद्युत संकेत भेजता है जिससे हम बिम्ब को देख पाने हैं।

कार्निया एक पारदर्शी गोलीय संरचना होता है जो आँख में प्रकाश का अपवर्तन करता है। परितारिका (आइरिस) मांस पेशियों का एक गहरे रंग का समूह होता है जो आँख की पुतली (Pupil) के आकार को नियंत्रित करता है। पुतली आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करती है। यदि प्रकाश बहुत तीव्र हो तो पुतली सिकुड़ कर छोटी हो जाती है। यदि प्रकाश मंद हो तो यह फैलकर अधिक खुल जाती है । प्रकाश कार्निया तथा पुतली में से होता हुआ लेंस पर पड़ता है जो उसे रेटिना पर फोकस कर देता है। रेटिना में प्रकाश संवेदनशील अनेक कोशिकांए होती हैं। प्रकाश के पड़ने पर ये कोशिकाएं सक्रिय हो जाती है, जिनसे विद्युत संकेत उत्पन्न होते हैं।

जो दृक् तंत्रिकाओं द्वारा हमारे मस्तिष्क मे पहुंचते हैं। हमारा मस्तिष्क इन संकेतों को प्रकाश के रूप मे प्रतिपादित करता है।
आख के विभिन्न भाग तथा उसके द्वारा किसी बिम्ब को फोकस करने की प्रक्रिया दिखाई गई है। वास्तव में हमारी आंख तथा कैमरे में कई मुख्य अंतर है। रेटिना का प्रतिबिम्ब स्थाई नहीं होता है और 1/20 सेकंड में लुफ्त हो जाता है ता उसके स्थान पर दूसरा प्रतिबिम्ब बन जाता है । इससे निरंतरता का अनुभव होता है। इससे भी महत्वपूर्ण अंतर यह है कि आंख के लेंस से जुड़ी मांसपेशियों के तनाव में परिवर्तन करके लेस की फोकस दूरी परिवर्तित की जा सकती है। जब तनाव कम होता है तो लेंस पतला हो जाता है और हम दूर रिथत वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। जब हम निकट की वस्तुओं को देखते हैं तब मांसपेशियों लेंस को सिकोड़ कर उसकी फोकत दूरी कम कर देती हैं। लेंस की फोकस दूरी में परिवर्तन होने के इस गुण को समंजन क्षमता कहते हैं।
लेंस की फोकस दूरी को एक नियत सीमा से कम नहीं किया जा सकता है। पुस्तक को अपनी ऑखो के बहुत निकट रखकर पढ़ने का प्रयत्न कीजिए। आप देखेंगे फि इससे आपकी आंखो पर जोर पड़ता है।

पुस्तक को सुविधापूर्वक पड़ने के लिए उसे आंख से लगभग 25 cm दूर रखना पड़ता है। वह कम से कम दूरी जिस पर रखी हुई वस्तु स्पष्ट दिखाई पडती है, स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी कहलाती है।

दृष्टि दोष तथा उनका निवारण (Defects of Vision and their Correction)

कभी-कभी आंखों की समंजन क्षमता क्षीण हो जाती है। ऐसा होने पर स्पष्ट नहीं दिखाई देता और दृष्टि धुंधली हो जाती है।
निकट दृष्टि- दोष अथवा मायोपिया (Myopia or Short- sightedness)-एक प्रकार के दूष्टि दोष, निकट स्थित वस्तुए तो स्पष्ट दिखाई पड़ती है परन्तु दूर स्थित वस्तुएं स्पष्ट नहीं दिखाई देती हैं। इस प्रकार की दोषयुक्त आंखों में दूर की वस्तुओं का प्रतिबिम्न रेटिना पर न बनकर उसके आगे बनता है।

दृष्टि के इस दोष को निकट दृष्टि दोष अथवा मायोपिया कहते हैं, तथा इसका निवारण उपयुक्त फोकस दूरी के अवतल लेंस की सहायता से किया जा सकता है ।उपयुक्त फोकस दूर का अवतल लेंस प्रतिबिम्ब को पुनः रेटिना पर बना देता है।

दूर दृष्टि दोष अथवा हाइपरमेट्रोपिया (Long-sightedness or Hypermetropia)-

दूसरी प्रकार का दृष्टि दोष, इस प्रकार का होता है कि इसमें दूर की वस्तुएं तो स्पष्ट दिखाई देती परन्तु निकट की वस्तुएं स्पष्ट नहीं दिखाई देती। इस दोष के कारण प्रतिबिम्ब रेटिना के पीछे बनता है, इस दोष को दूरदृष्टि दोष अथवा हाइपरमेट्रोपिया कहते हैं। दूर दृष्टि दोष का निवारण किसी उपयुक्त फोकस दूरी के उत्तल लेंस की सहायता से किया जा सकता

कुछ व्यक्तियों में मायोपिया तथा हाइपरमेट्रोपिया दोनों ही दोष एक साथ होते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति प्रायः द्विफोकसी लेंस उपयोग में लाते हैं, जिनका एक भाग अवतल लें स की तरह कार्य करता है। तथा दूसरा उत्तल लें स की तरह । आँख के तीसरे प्रकार के दोष को अबिन्दुता (Astigmatism) कहते हैं। यह लगभग गोलीय विपथन दोष की तरह होता है। इस दोष का निवारण बेलनाकार लेंसों की सहायता से किया जाता है।

सूक्ष्मदर्शी तथा दूरबीन (Microseope and Telescope)


सूक्ष्मदर्शी (Microscope) – सूक्ष्मदर्शी एक ऐसा यन्त्र होता है, जिसकी सहायता से हम अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुओं को देख सकते हैं। इस सूक्ष्मदर्शी में छोटी फोकस दूरी का एक उत्तल लेंस होता है। इस लेंस को आवर्धक (Magnifying) लेंस भी कहतो हैं। जब कि वस्तु को इस लेंस के सामने इसकी फोकस दूरी से कम दूरी पर रखते हैं तो वस्तु का आभासी , सीधा व बड़ा प्रतिबिम्ब बनता है।
वस्तुओं का छोटी या बड़ी दिखायी देना उनके द्वारा हमारी आँख एक बनाये गये दर्शन कोण (Visual Angle) पर निर्भर करता है। यदि दर्शन कोण बहुत छोटा है तो वस्तुयें छोटी दिखायी देती है तथा दर्शन कोण बड़ा होने पर वस्तुयें बड़ी दिखायी देती हैं। यदि हम किसी वस्तु को अपनी आँख के समीप लाये तो दर्शन कोण बड़ा होने वे कारण वस्तु हमें बड़ी दिखायी देगी लेकिन एक निश्चित सीमा (दृष्टि
की न्यूनतम दूरी) के बाद वस्तु स्पष्ट दिखायी नहीं देगी। अत: सूक्ष्म वस्तु को स्पष्ट देखने के लिये सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग करते हैं । इसका उपयोग स्केल (Scale) के बने छोटे-छोटे खानों के बीच की दूरी पढ़ने, फिंगरप्रिंट (Fingerprint) की जांच करने, सूक्ष्म जीवाशुओं को देखने आदि के काम आता है।
सरल सूक्ष्मदर्शी से हम वरतुओं के आकार को लगभग दस गुना बड़ा करके देख सकते हैं अर्थात् इसकी आवर्धन क्षमता लगभग दस गुना होती है। इससे अधिक आवर्धन प्राप्त करने के लिये हम संयुक्त सूक्ष्मदर्शी को प्रयोग में लाते हैं। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में दो उत्तल लेंस होते हैं। इनमें से एक को अभिदृश्यक (Objective) व दूसरे को नेत्रिका (Eye Piece) कहते हैं। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी की आवर्धन क्षमता सरल सूक्ष्यमदर्श की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। नेत्रिका तथा अभिदृश्यक में जितनी ही कम फोकस दूरी के लेंसों का उपयोग होता है उसकी आवर्धन क्षमता उतनी ही अधिक होती है। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का उपयोग प्रयोगशालाओं में सूक्ष्म जन्तुओं, वनस्पतियों आदि के आकार को बड़ा करके देखने के लिए होता है। इसके द्वारा खून, बलगन आदि की भी जांच की जाती है।

दूरदर्शी (Telescope) –

दूरदर्शी का उपयोग आकाशीय पिण्डों जैसे चन्द्रमा, तारे व पृथ्वी की सतह पर दूर स्थित वस्तुओं को देखने में किया जाता है, इसमें दो उत्तल लेंस होते हैं-एक को अभिदृश्यक व दूसरे को नेत्रिका कहते हैं।

अभिदृश्यक की फोकस दूरी नेत्रिका से अधिक होती है। अभिदृश्यक लेंस अधिक द्वारक (Operture) का होता है जिससे यह दूर से आने वाले प्रकाश की अधिक मात्रा को एकत्रित करता है। अभिदृश्यक लेंस एक वेलनाकार
नली के एक किनारे पर लगा होता है। नेत्रिका लेंस भी दूसरी बेलनाकार नली के एक किनारे पर लगा होता है। इन दोनों नलियों को एक-दूसरे से इस प्रकार समायोजित करते हैं कि उन्हें आगे पीछे खिसकाया जा सकता है।

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