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जम्मू और कश्मीर का इतिहास – Exam Guider

जम्मू और कश्मीर का इतिहास

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जम्मू और कश्मीर का इतिहास

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33.45°N 76.24°Eजम्मू और कश्मीर भारत का सबसे उत्तर में स्थित राज्य है।

 

पाकिस्तान इसके उत्तरी इलाके (“पाक अधिकृत कश्मीर”) या तथाकथित “आज़ाद कश्मीर” के हिस्सों पर क़ाबिज़ है, जबकि चीन ने अक्साई चिन पर कब्ज़ा किया हुआ है। भारत इन कब्ज़ों को ग़ैरक़ानूनी मानता है जबकि पाकिस्तान भारतीय जम्मू और कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र मानता है। राज्य की आधिकारिक भाषा उर्दू है।
‘जम्मू और कश्मीर’ में जम्मू (पुँछ सहित), कश्मीर, लद्दाख, बल्तिस्तान एवं गिलगित के क्षेत्र सम्मिलित हैं। इस राज्य का पाकिस्तान अधिकृत भाग को लेकर क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग कि.मी. एवं उसे 1,38,124 वर्ग कि.मी. है। यहाँ के निवासियों में अधिकांश मुसलमान हैं, किंतु उनकी रहन-सहन, रीति-रिवज एवं संस्कृति पर हिंदू धर्म की पर्याप्त छाप है। कश्मीर के सीमांत क्षेत्र पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सिंक्यांग तथा तिब्बत से मिले हुए हैं। कश्मीर भारत का महत्वपूर्ण राज्य है।

जम्मू और कश्मीर के लिए राजतरंगिणी तथा नीलम पुराण नामक दो प्रामाणिक ग्रंथों में यह आख्यान मिलता है कि कश्मीर की घाटी कभी बहुत बड़ी झील हुआ करती थी। इस कथा के अनुसार कश्यप ऋषि ने यहाँ से पानी निकाल लिया और इसे मनोरम प्राकृतिक स्थल में बदल दिया, किंतु भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण खदियानयार, बारामुला में पहाड़ों के धंसने से झील का पानी बहकर निकल गया और इस तरह ‘पृथ्वी पर स्वर्ग’ कहलाने वाली कश्मीर की घाटी अस्तित्व में आई।

ऐतिहासिक उल्लेख
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रसार किया। बाद में कनिष्क ने इसकी जड़ें और गहरी कीं। छठी शताब्दी के आरंभ में कश्मीर पर हूणों का अधिकार हो गया। यद्यपि सन् 530 में घाटी फिर स्वतंत्र हो गई लेकिन इसके तुरंत बाद इस पर उज्जैनसाम्राज्य का नियंत्रण हो गया। विक्रमादित्य राजवंश के पतन के पश्चात कश्मीर पर स्थानीय शासक राज करने लगे। वहां हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का मिश्रित रूप विकसित हुआ। कश्मीर के हिन्दू राजाओं में ललितादित्य (सन 697 से सन् 738) सबसे प्रसिद्ध राजा हुए जिनका राज्य पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण में कोंकण, उत्तर-पश्चिम में तुर्किस्तान, और उत्तर-पूर्व में तिब्बत तक फैला था। ललितादित्य ने अनेक भव्य भवनों का निर्माण किया।भारतीय जम्मू और कश्मीर के तीन मुख्य अंचल हैं : जम्मू (हिन्दू बहुल), कश्मीर (मुस्लिम बहुल) औरलद्दाख़ (बौद्ध बहुल)। ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर है और शीतकालीन राजधानी जम्मू-तवी। कश्मीर प्रदेश को ‘दुनिया का स्वर्ग’ माना गया है। अधिकांश राज्य हिमालय पर्वत से ढका हुआ है। मुख्य नदियाँ हैं सिन्धु, झेलम और चेनाब। यहाँ कई ख़ूबसूरत झीलें हैं: डल, वुलर और नागिन।

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इस्लाम का आगमन
कश्मीर में इस्लाम का आगमन 13 वीं और 14वीं शताब्दी में हुआ। मुस्लिम शासको में जैन-उल-आबदीन (1420-70) सबसे प्रसिद्ध शासक हुए, जो कश्मीर में उस समय सत्ता में आए, जब तातरों के हमले के बाद हिन्दू राजा सिंहदेव भाग गए। बाद में चक शासकों ने जैन-उल-आवदीन के पुत्र हैदरशाह की सेना को खदेड़ दिया और सन् 1586 तक कश्मीर पर राज किया। सन् 1586 में अकबर ने कश्मीर को जीत लिया। सन् 1752 में कश्मीर तत्कालीन कमज़ोर मुग़ल शासक के हाथ से निकलकर अफ़ग़ानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली के हाथों में चला गया। 67 साल तक पठानों ने कश्मीर घाटी पर शासन किया।

अन्य उल्लेख
जम्मू का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। हाल में अखनूर से प्राप्त हड़प्पा कालीन अवशेषों तथा मौर्य, कुषाण और गुप्त काल की कलाकृतियों से जम्मू के प्राचीन स्वरूप पर नया प्रकाश पड़ा है। जम्मू 22 पहाड़ी रियासतों में बंटा हुआ था। डोगरा शासक राजा मालदेव ने कई क्षेत्रों को जीतकर अपने विशाल राज्य की स्थापना की। सन् 1733 से 1782 तक राजा रंजीत देव ने जम्मू पर शासन किया किंतु उनके उत्तराधिकारी दुर्बल थे, इसलिए महाराजा रणजीत सिंह ने जम्मू कोपंजाब में मिला लिया। बाद में उन्होंने डोगरा शाही ख़ानदान के वंशज राजा गुलाब सिंह को जम्मू राज्य सौंप दिया। 1819 में यह पंजाब के सिक्ख शासन के अंतर्गत आया और 1846 में डोगरा राजवंश के अधीन हो गया। गुलाब सिंह रणजीत सिंह के गवर्नरों में सबसे शक्तिशाली बन गए और लगभग समूचे जम्मू क्षेत्र को उन्होंने अपने राज्य में मिला लिया।
वर्तमान स्वरूप
अपने वर्तमान स्वरूप में जम्मू – कश्मीर का अंचल, 1846 में रूपायित हुआ। जब प्रथम सिक्ख युद्ध के अंत में लाहौर और अमृतसर की संधियों के द्वारा जम्मू के डोगरा शासक राजा गुलाब सिंह एक विस्तृत, लेकिन अनिश्चित से हिमालय क्षेत्रीय राज्य, जिसे ‘सिंधु नदी के पूर्व की ओर रावी नदी के पश्चिम की ओर’ शब्दावली द्वारा परिभाषित किया गया था, के महाराजा बन गए।

डल झील, श्रीनगर
Dal Lake, Srinagar
अंग्रेज़ों के लिए इस संरक्षित देशी रियासत की रचना ने उनके साम्राज्य के उत्तरी भाग को सुरक्षित बना दिया था, जिससे वे 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दौरान सिंधु नदी तक और उसके आगे बढ़ सकें। इस प्रकार यह राज्य एक जटिल राजनीतिक मध्यवर्ती क्षेत्र का भाग बन गया जिसे अंग्रेज़ों ने उत्तर में अपने भारतीय साम्राज्य और रूसी व चीनी साम्राज्य के बीच स्थापित कर दिया था। गुलाब सिंह का इस पर्वतीय अंचल पर शासनाधिकार मिल जाने से लगभग एक – चौथाई सदी से पंजाब के सिक्ख साम्राज्य की उत्तरी सीमा रेखा के पास की छोटी – छोटी रियासतों के बीच चल रही मुहिम और कूटनीतिक चर्चा का अंत हो गया।

19वीं सदी के इस अंचल की सीमा – निर्धारण के कुछ प्रयास किए गए, लेकिन सुस्पष्ट परिभाषा करने के प्रयत्न अक्सर इस भूभाग की प्रकृति और ऐसे विशाल क्षेत्रों के कारण, जो स्थायी बस्तियों से रहित थे, सफल नहीं हो पाए। उदाहरणार्थ – सुदूर उत्तर में महाराजा की सत्ता कराकोरम पर्वत श्रेणी तक फैली हुई थी। लेकिन उसके आगे तुर्किस्तान और मध्य एशिया के सिक्यांग क्षेत्रों की सीमा रेखा पर एक विवादास्पद क्षेत्र बना रहा और सीमा रेखा कभी निश्चित नहीं हो पाई। इसी प्रकार की शंकाएँ उस सीमा क्षेत्र के बारे में रही, जो उत्तर में अक्साई चिन को आस पास से घेरे हुए है और आगे जाकर तिब्बत की सुस्पष्ट सीमा रेखा से मिलता है और जो सदियों से लद्दाख क्षेत्र की पूर्वी सीमा पर बना हुआ था। पश्चिमोत्तर में सीमाओं का स्वरूप 19वीं शताब्दी के आख़िरी दशक में अधिक स्पष्ट हुआ। जब ब्रिटेन ने पामीर क्षेत्र में सीमा निर्धारण सम्बन्धी समझौते अफ़ग़ानिस्तान और रूस के साथ सम्पन्न किए। इस समय गिलगित, जो हमेशा कश्मीर का भाग समझा जाता था, रणनीतिक कारणों से 1889 में एक ब्रिटिश एजेंट के तहत एक विशेष एजेंसी के रूप में गठित किया गया। सन् 1947 में जम्मू पर डोगरा शासकों का शासन रहा। इसके बाद महाराज हरि सिंह ने 26 अक्तूबर, 1947 को भारतीय संघ में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये।

अनुच्छेद 370
ब्रिटिश हुकूमत की समाप्ति के साथ ही जम्मू और कश्मीर भी आज़ाद हुआ। शुरू में इसके शासक महाराज हरीसिंह ने फैसला किया कि वह भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित न होकर स्वतंत्र रहेंगे, लेकिन 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान समर्थक आज़ाद कश्मीर सेना ने राज्य पर आक्रमण कर दिया, जिससे महाराज हरीसिंह ने राज्य को भारत में मिलाने का फैसला लिया। उस विलय पत्र पर 26 अक्टूबर, 1947 को पण्डित जवाहरलाल नेहरू और महाराज हरीसिंह ने हस्ताक्षर किये। इस विलय पत्र के अनुसार- “राज्य केवल तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार -पर अपना अधिकार नहीं रखेगा, बाकी सभी पर उसका नियंत्रण होगा। उस समयभारत सरकार ने आश्वासन दिया कि इस राज्य के लोग अपने स्वयं के संविधान द्वारा राज्य पर भारतीय संघ के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करेंगे। जब तक राज्य विधान सभा द्वारा भारत सरकार के फैसले पर मुहर नहीं लगाया जायेगा, तब तक भारत का संविधान राज्य के सम्बंध में केवल अंतरिम व्यवस्था कर सकता है। इसी क्रम में भारतीय संविधान में ‘अनुच्छेद 370’ जोड़ा गया, जिसमें बताया गया कि जम्मू-कश्मीर से सम्बंधित राज्य उपबंध केवल अस्थायी है, स्थायी नहीं।

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भारतीय संविधान में जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति
संवैधानिक प्रावधान स्वतः जम्मू तथा कश्मीर पर लागू नहीं होते। केवल वहीं प्रावधान जिनमे स्पष्ट रूप से कहा जाए कि वे जम्मू कश्मीर पे लागू होते है, उस पर लागू होते हैं। जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति का ज्ञान इन तथ्यों से होता है-
1. जम्मू कश्मीर संविधान सभा द्वारा निर्मित राज्य संविधान से वहाँ का कार्य चलता है ये संविधान जम्मू कश्मीर के लोगों को राज्य की नागरिकता भी देता है केवल इस राज्य के नागरिक ही संपत्ति खरीद सकते है या चुनाव लड सकते है या सरकारी सेवा ले सकते है
2. संसद जम्मू कश्मीर से संबंध रखने वाला ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती है जो इसकी राज्य सूची का विषय हो
3. अवशेष शक्ति जम्मू कश्मीर विधान सभा के पास होती है
4. इस राज्य पर सशस्त्र विद्रोह की दशा मे या वित्तीय संकट की दशा मे आपात काल लागू नहीं होता है
5. संसद राज्य का नाम क्षेत्र सीमा बिना राज्य विधायिका की स्वीकृति के नहीं बदलेगीं
6. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति राज्य मुख्यमंत्री की सलाह के बाद करेगी
7. संसद द्वारा पारित निवारक निरोध नियम राज्य पर अपने आप लागू नहीं होगा
8. राज्य की पृथक दंड संहिता तथा दंड प्रक्रिया संहिता है

मैदान
जम्मू क्षेत्र में संकीर्ण मैदानी प्रवेश की विशेषता तराइयों से निकली जलधाराओं के द्वारा जमा अवसाद और दोमट मिट्टी व लोएस (वायु के द्वारा लाकर जमा की गई मिट्टी) से ढके एकदम अलग हो चुके अपरदित चट्टान से निर्मित रेतीले जलोढ़ पंखों के अंतःबंधन हैं। जो अभिनूतन (प्लीस्टोसीन) युग (यानी 10 हज़ार से 16 लाख वर्ष पुराना) के हैं। यहाँ वर्षा 380 से 500 मिमी वार्षिक तक होती है। गर्मी के मौसम में (जून से सितंबर में) जब मानसूनी हवाएँ चलती हैं, तब तेज़ लेकिन अनियमित फुहारों के रूप में वर्षा होती है। अंदरूनी इलाक़ा पेड़ों से पूरी तरह विहीन हो गया है और कंटीली झाड़ियाँ या मोटी घास ही यहाँ की मुख्य वनस्पति है।

 

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तराई क्षेत्र
हिमालय की तराइयों से, जिनकी ऊँचाई 610 से 2134 मीटर तक है, बाहरी और भीतरी प्रक्षेत्र निर्मित है। बाहरी परिक्षेत्र की रचना बलुआ पत्थर, चिकनी मिट्टी, पंक और संपिड़ित चट्टानों से हुई है। ये क्षेत्र हिमालय की वलन गतिविधि से प्रभावित होकर और अपरदन के कारण लम्बे पर्वतीय कटकों और घाटियों (दून) के आकार के हो गए हैं। अंदरूनी प्रक्षेत्र अधिक भीमकाय तलछटी चट्टानों से, जिसमें मिओसीन युग (लगभग 53 से 237 लाख वर्ष पूर्व) के लाल बलुआ पत्थर शामिल हैं, से बना है। जिनके मुड़ने टुटने और क्षारित होने से खड़ी ढलान वाले पर्वत स्कंधों व पठारों का निर्माण हुआ। नदी घाटियों की कटान तीखी व सीढ़ीदार है और भ्रंशों से ऊधमपुर तथा पुंछ जैसे जलोढ़ मिट्टी के बेसिन बन गए हैं। ऊँचाई के साथ – साथ वर्षा बढ़ती जाती है और ऊँचाई बढ़ने के साथ निचली झाड़ीदार भूमि का स्थान देवदार और चीड़ के जंगल ले लेते हैं।

कश्मीर की घाटी
कश्मीर की घाटी का एक गहरा तथा विषम बेसिन है, जो पीर पंजाल और विशाल हिमालय पर्वत श्रेणी के पश्चिम छोर के बीच में स्थित औसतन 1,600 मीटर की ऊँचाई वाली है। अभिनूतन (प्लीस्टोसीन) युग के दौरान यह कभी करेवा झील की तलहटी थी। अब यह ऊपरी झेलम नदी के द्वारा जमा की गई तलछट और जलोढ़ मिट्टी से भरी हुई है। मिट्टी और पानी की स्थितियों में उल्लेखनीय विविधता है। जलवायु की दृष्टि से यहाँ लगभग 750 मिमी वार्षिक वर्षा होती है। कुछ तो ग्रीष्म कालीन मानसूनी हवाओं से और कुछ शीत ¬ ऋतु में कम दाब की प्रणाली से सम्बद्ध हवाओं से होती है। अक्सर हिमपात का साथ वर्षा और ओले देते हैं। ऊँचाई के कारण तापमान काफ़ी परिवर्तित हो जाता है। श्रीनगर में न्यूनतम औसत तापमान जनवरी में 2 डिग्री से. होता है और अधिकतम औसत तापमान जुलाई में 31 डिग्री से. तक रहता है।

भारतीय पक्ष
पाकिस्तान ने अपना अधिकृत कश्मीरी भूभाग खाली नहीं किया है, बल्कि कुटिलतापूर्वक वहाँ कबाइलियों को बसा दिया है।
• जम्मू और कश्मीर की लोकतान्त्रिक और निर्वाचित संविधान-सभा ने 1957 में एकमत से ‘महाराजा द्वारा कश्मीर के भारत में विलय के निर्णय’ को स्वीकृति दे दी और राज्य का ऐसा संविधान स्वीकार किया जिसमें कश्मीर के भारत में स्थायी विलय को मान्यता दी गयी थी। (पाकिस्तान में लोकतंत्र का कितना सम्मान है, यह पूरा विश्व जानता है)
• भारतीय संविधान के अन्तर्गत आज तक जम्मू कश्मीर मे सम्पन्न अनेक चुनावों में कश्मीरी जनता ने वोट डालकर एक प्रकार से
भारत में अपने स्थायी विलय को ही मान्यता दी है। जम्मू कश्मीर के प्रमुख राजनैतिक दल भी * पाकिस्तान के धर्माधारित दो-राष्ट्र सिद्धान्त को नहीं मानते।
• कश्मीर का भारत में विलय ब्रिटिश “भारतीय स्वातन्त्र्य अधिनियम” के तहत क़ानूनी तौर पर सही था।
• पाकिस्तान अपनी भूमि पर आतंकवादी शिविर चला रहा है (ख़ास तौर पर 1989 से) और कश्मीरी युवकों को भारत के ख़िलाफ़ भड़का रहा है। ज़्यादातर आतंकवादी स्वयं पाकिस्तानी नागरिक या तालिबानी अफ़ग़ान ही हैं। ये और कुछ दिग्भ्रमित कश्मीरी युवक मिलकर इस्लाम के नाम पर भारत के ख़िलाफ़ छेड़े हुए हैं। * राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत स्वायत्तता प्राप्त है।
• कश्मीर के भारत से अलग होने के बाद भारत की उत्तरी सीमा सुरक्षित नहीं रहेगी।

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जिले
अनन्तनाग जिला
• उधमपुर जिला
• कठुआ जिला
• कारगिल जिला
• कुपवाड़ा जिला
• जम्मू जिला
• डोडा जिला
• पुंछ जिला
• पुलवामा जिला
• बड़गांव जिला
• बारामूला जिला
• लेह जिला
• राजौरी जिला
• श्रीनगर जिला

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जम्मू और कश्मीर पूर्वात्तर में सिंक्यांग का स्वायत्त क्षेत्र व तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र (दोनों चीन के भाग) से, दक्षिण मेंहिमाचल प्रदेश व पंजाब राज्यों से, पश्चिम में पाकिस्तान और पश्चिमोत्तर में पाकिस्तान अधिकृत भूभाग से घिरा है।

स्थिति

जम्मू और कश्‍मीर राज्‍य 32-15 और 37-05 उत्तरी अक्षांश और 72-35 तथा 83-20 पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है। भौगोलिक रूप से इस राज्‍य को चार क्षेत्रों में बांटा जा सकता है।

  1. पहाड़ी और अर्द्ध-पहाड़ी मैदान जो कंडी पट्टी के नाम से प्रचलित है
  2. पर्वतीय क्षेत्र जिसमेंशिवालिक पहाड़ियाँ शामिल हैं
  3. कश्‍मीर घाटीके पहाड़ और पीर पांचाल पर्वतमाला
  4. तिब्‍बत से लगालद्दाख और कारगिल क्षेत्र

भौगोलिक तथा सांस्‍कृतिक रूप से राज्‍य के तीन ज़िला क्षेत्र जम्मू कश्‍मीर और लद्दाख हैं।

जम्मू क्षेत्र में संकीर्ण मैदानी प्रवेश की विशेषता तराइयों से निकली जलधाराओं के द्वारा जमा अवसाद और दोमट मिट्टी वलोएस (वायु के द्वारा लाकर जमा की गई मिट्टी) से ढके एकदम अलग हो चुके अपरदित चट्टान से निर्मित रेतीले जलोढ़ पंखों के अंतःबंधन हैं। जो अभिनूतन (प्लीस्टोसीन) युग (यानी 10 हज़ार से 16 लाख वर्ष पुराना) के हैं। यहाँ वर्षा 380 से 500 मिमी वार्षिक तक होती है। गर्मी के मौसम में (जून से सितंबर में) जब मानसूनी हवाएँ चलती हैं, तब तेज़ लेकिन अनियमित फुहारों के रूप में वर्षा होती है। अंदरूनी इलाक़ा पेड़ों से पूरी तरह विहीन हो गया है और कंटीली झाड़ियाँ या मोटी घास ही यहाँ की मुख्य वनस्पति है।

तराई क्षेत्र

हिमालय की तराइयों से, जिनकी ऊँचाई 610 से 2134 मीटर तक है, बाहरी और भीतरी प्रक्षेत्र निर्मित है। बाहरी परिक्षेत्र की रचना बलुआ पत्थर, चिकनी मिट्टी, पंक और संपिड़ित चट्टानों से हुई है। ये क्षेत्र हिमालय की वलन गतिविधि से प्रभावित होकर और अपरदन के कारण लम्बे पर्वतीय कटकों और घाटियों (दून) के आकार के हो गए हैं। अंदरूनी प्रक्षेत्र अधिक भीमकाय तलछटी चट्टानों से, जिसमें मिओसीन युग (लगभग 53 से 237 लाख वर्ष पूर्व) के लाल बलुआ पत्थर शामिल हैं, से बना है। जिनके मुड़ने टुटने और क्षारित होने से खड़ी ढलान वाले पर्वत स्कंधों व पठारों का निर्माण हुआ। नदी घाटियों की कटान तीखी व सीढ़ीदार है और भ्रंशों से ऊधमपुर तथा पुंछ जैसे जलोढ़ मिट्टी के बेसिन बन गए हैं। ऊँचाई के साथ – साथ वर्षा बढ़ती जाती है और ऊँचाई बढ़ने के साथ निचली झाड़ीदार भूमि का स्थान देवदार और चीड़ के जंगल ले लेते हैं। 

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पीर पंजाल पर्वत श्रेणी

पीर पंजाल पर्वत श्रेणी हिमालय से संम्बद्ध पहली पर्वत शृंखला है। इसकी औसत शीर्ष रेखा 3,810 मीटर ऊँची है। जिसमें कोई – कोई चोटी 4,572 मीटर तक ऊँची है। ग्रेनाइट, शैल, क्वार्टज व स्लेट से बनी चट्टानों वाली यह पर्वतश्रेणी अभिनूतन (प्लीस्टोसीन) युग में कई बार उत्थान तथा दरार पड़ने जैसी भौगोलिक घटनाओं का शिकार हुई और ग्लेशियरों से प्रभावित हुई। पर्वतमाला पर शीत ­ऋतु में काफ़ी बर्फ़ गिरती है और गर्मी में काफ़ी बारिश होती है। इसमें विशाल चरागाह क्षेत्र हैं, जो वृक्ष क्षेत्र से ऊपर की तरफ़ हैं।

कश्मीर की घाटी

कश्मीर की घाटी का एक गहरा तथा विषम बेसिन है, जो पीर पंजाल और विशाल हिमालय पर्वत श्रेणी के पश्चिम छोर के बीच में स्थित औसतन 1,600 मीटर की ऊँचाई वाली है। अभिनूतन (प्लीस्टोसीन) युग के दौरान यह कभी करेवा झील की तलहटी थी। अब यह ऊपरी झेलम नदी के द्वारा जमा की गई तलछट और जलोढ़ मिट्टी से भरी हुई है। मिट्टी और पानी की स्थितियों में उल्लेखनीय विविधता है। जलवायु की दृष्टि से यहाँ लगभग 750 मिमी वार्षिक वर्षा होती है। कुछ तो ग्रीष्म कालीन मानसूनी हवाओं से और कुछ शीत ­ ऋतु में कम दाब की प्रणाली से सम्बद्ध हवाओं से होती है। अक्सर हिमपात का साथ वर्षा और ओले देते हैं। ऊँचाई के कारण तापमान काफ़ी परिवर्तित हो जाता है। श्रीनगर में न्यूनतम औसत तापमान जनवरी में 2 डिग्री से. होता है और अधिकतम औसत तापमान जुलाई में 31 डिग्री से. तक रहता है।

 ऊपरी सिंधु घाटी

ऊपरी सिंधु घाटी की एक सुपरिभाषित भौगोलिक विशेषता है, जो भूगर्भीय संरचना की प्रवृत्ति के अनुसार है। यह तिब्बत की सीमा से पश्चिम की ओर आगे बढ़ते हुए पाकिस्तानी भू – भाग में उस बिन्दु तक जाती है, जहाँ विशाल नंगा पर्वत का चक्कर काटकर दक्षिण की ओर इसके आर पार कटे महाखड्ड की ओर जाती है। ऊपरी भागों में यह नदी दोनों तरफ़ बजरी की सीढ़ीनुमा संरचनाओं से घिरी है। प्रत्येक सहायक नदी मुख्य घाटी में बाहर निकलते हुए एक जलोढ़ पंख बनाती है। लेह नगर इसी प्रकार के एक जलोढ़ पंख पर स्थित है और समुद्री सतह से 3,500 मीटर की ऊँचाई पर है।

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कराकोरम पर्वतश्रेणी

ग्रेनाइट – पट्टिताश्म का विशाल पर्वत पिंड, कराकोरम शृंखला, भारतीय क्षेत्र से पाकिस्तानी भूमि तक फैली हुई है। इसमें संसार की सर्वोच्च चोटियों में से कुछ हैं, जिसमें से एक ‘के – 2’ है, जिसकी ऊँचाई 8,611 मीटर है। कम से कम 30 अन्य चोटियाँ 7,315 मीटर से अधिक ऊँची हैं। यह पर्वतमाला, जो बड़े भारी ग्लेशियरों से पटी पड़ी है, शुष्क और वीरान पठारों से ऊपर उभरी हुई हैं। विषम तापमान और विखंडित चट्टानों के मलबे इसकी विशेषताएँ हैं। कराकोरम को ‘दुनिया की छत’ कहा जाना बिल्कुल उचित प्रतीत होता है।

जम्मू और कश्मीर की जलवायु

  • जम्मू और कश्मीरराज्य का 90 प्रतिशत से अधिक भाग पहाड़ी क्षेत्र है।
  • इस क्षेत्र को भौगोलिक आकृति की दृष्टि से इस सात भागों में बाँटा गया है।
  • जो पश्चिमीहिमालय के संरचानात्मक घटकों से जुड़े हैं।

 

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