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स्टीफन हाकिंग : ब्रह्मांड की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाने वाला महान वैज्ञानिक – Exam Guider

स्टीफन हाकिंग : ब्रह्मांड की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाने वाला महान वैज्ञानिक

स्टीफन हाकिंग : ब्रह्मांड की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाने वाला महान वैज्ञानिक

खगोल भौतिकी जगत के पर्याय बन चुके ब्रिटिश विज्ञानी स्टीफन विलियम हॉकिंग की यशस्विता उनके जीवनकाल में ही इतनी शिखरस्थ हो चुकी थी कि उन्हें बीसवीं शती की मानवीय मेधा के चरमोत्कर्ष महाविज्ञानी प्रो. अल्बर्ट आइंस्टाइन के समकक्ष माने जाने लगा था। उनकी विश्वविश्रुति के दो कारण है। एक तो वह कि ‘दिक्’ और ‘काल’ (Space & Time) की गूढ़ बातें आम श्रोता/पाठक के पल्ले नहीं पड़ती, उन्हें समझने के लिए भौतिकी, गणित और खगोल का आधारिक ज्ञान वांछनीय है। जैसा कि आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत भी अपनी जटिलता के कारण आम आदमी की समझ के परे था, जटिलता के गूढ़ आवरण में लिपटे इसी सिद्धांत ने आइंस्टाइन को युग पुरुष बना दिया। हॉकिंग का भी कार्यक्षेत्र ब्रह्मांड की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाने की दिशा में एक अग्रगामी चरण था जो समय से पर्याप्त आगे है, अतः आम जिज्ञासुओं के लिए नितांत सरल । ब्रह्मांड की अनसुलझी गुत्थियों के संदर्भ में हॉकिंग का गहन और गूढ़ चिंतन न समझ पाने पर भी वे विश्व जनसमुदाय के आकर्षण का केन्द्र बन चुके थे और लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुंच चुके थे। उनकी पुस्तक ‘समय का सूक्ष्म इतिहास’ (A Brief History of Time) जब छप कर बाजार में आयी तो इसने बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अब तक यह पुस्तक विश्व की चालीस भाषाओं में अनूदित हो चुकी है ।

उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण कदाचित उनकी अपंगता थी। चलने-फिरने, बोल सकने में नितांत अशक्त व्यक्ति इतना जटिल चिंतन भी कर सकता है, यह जिज्ञासा लोगों को सहज ही हॉकिंग की ओर उन्मुख करती है। 21 वर्ष (1963) की अल्पवय में (जन्म 8 जनवरी, 1942 आक्सफोर्ड) हाकिंग एक असाध्य रोग से ग्रस्त हो गए थे, जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में एमियोट्राफिक लेटरल स्कलेरोसिस (ए.एल.एस.) कहते हैं। तब डाक्टरों ने घोषणा की थी कि वे मात्र 3 वर्ष तक बमुश्किल अपने जीवन की डोर खींच सकते हैं। कोई काम कर पाना नितांत असंभव है। लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति और संकल्प के धनी हॉकिंग ने चिकित्सकों की भविष्यवाणी को झुठला दिया और उन्होंने 76 वर्षों का जीवन जिया (निधन, 14 मार्च, 2018)। और इस प्रकार वह चिकित्सकों के लिए एक पहेली और भौतिकी तथा खगोल जगत के पर्याय बन गए।

ए.एल.एस. (Amyotrophic Lateral Sclerosis) का शिकार होकर हाकिंग विकलांग हो गये थे। उनके चेहरे की कुछ मांसपेशियां हिलती थीं। बाएं हाथ की मात्र एक अंगुली काम करती थी। व्हील चेयर पर बैठे हॉकिंग अपनी एक अंगुली के सहारे एक-एक शब्द खोजते और कुर्सी से जुड़े कम्प्यूटर से अपना काम करते थे। 1985 में निमोनिया ने जब उन्हें आक्रांत किया तो डाक्टरों ने किसी तरह उनकी जान तो बचा ली लेकिन वाणी सर्वदा के लिए विलुप्त हो गयी और उसके बाद वे वायस सिंथेसाइजर के द्वारा ही शब्दालाप करते थे। प्राकृतिक अभिशाप को झुठलाते हुए हॉकिंग अपने ब्रह्मांडीय संसार में लीन थे और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित के आचार्य के रूप में 1979 से 2000 तक प्रतिष्ठ रहे जिस कुर्सी पर कभी न्यूटन महान (1663) आसीन थे। पहले टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान (Tata latitute of Fundamental Romarch, TIFR), मुंबई द्वारा आयोजित ‘रिटंग-2701’ नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने भातिकी के सर्वथा नुतन तथा रोमांचक आध्याय ‘स्ट्रिंग सिद्धांत’ पर व्याख्यान दिये।

मुंबई में अपने स्वीच सिंथेसाइजर के द्वारा उन्होंने दो व्याख्यान दिये जिनके विषय थे संक्षेप में हमारा ब्रह्मांड’ और ‘भविष्य में विज्ञान’। व्याख्यान के पहले विषय पर उन्होंने इसी शीर्षक (The universe:in Nutshelly न एक और विश्वविद्युत पुस्तक भी लिखी है। फिर सेंटर फॉर फिलासफी एंड फाउंडेशन आफ साइंस, नई दिल्ली के आमंत्रण पर दिल्ली पधारे जहां उन्हें अल्बर्ट आइंस्टाइन व्याख्यान- 2021’ देना था। सीरी फोर्ट सभागार में, उन्होंने ‘भविष्य कथन : ज्योतिष से कृष्ण विवर तक’ (Predicting the Future : From Astrology to Back Holes) शीर्षक से अपना व्याख्यान दिया। कहते हैं कि इतना व्यापक जनसमूह इससे पूर्व दिल्ली में किसी भी वैज्ञानिक व्याख्यान को सुनने के लिए नहीं आया था ।

हॉकिंग का ब्रह्मांड

हॉकिंग का वैयक्तिक संसार तो मात्र एक व्कील चेयर तक सीमित था लेकिन उनका वैचारिक संसार असीमित। उन्होंने ब्रह्मांडीय मॉडल की परिकल्पना अपने ढंग से की है। उनके चिंतन के नव आयाम हैं- हमारा ब्रह्मांड कैसे निर्मित हुआ, इसका कभी अंत भी होगा, यदि होगा तो कैसे? हॉकिंग महाविज्ञानी आइंस्टाइन के सापेक्षवाद की व्याख्या करते हुए घोषित करते हैं कि दिक् और काल (Space & Time) का आरंभ महाविस्फोट (Big Bang) से हुआ और इसकी परिणति कृष्ण विवर (Black Hole) में होगी। जार्ज गैमो द्वारा प्रतिपादित (1948) और फ्रेड हाॅयल द्वारा नामित महाधमाका सिद्धांत कहता है कि आज से प्रायः 15 अरब वर्ष पूर्व महाधमाके के रूप में हमारे ब्रह्मांड की शुरुआत हुई, जब समूची द्रव्यराशि अत्यंत सूक्ष्म बिंदु स्वरूप थी। इसी महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का प्रसार हुआ अर्थात हमारा ब्रह्मांड 15 अरब वर्ष पुराना है। हाॅकिंग कहते हैं कि महाविस्फोट के पूर्व समय का कोई अस्तित्व नहीं था। वस्तुतः हम उससे पीछे नहीं झांक सकते। समय की यदि शुरुआत हुई है तो उसका अंत भी होगा।

यहाँ पर भारतीय वैज्ञानिक डॉ. सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर भौतिकीविदों की मदद करते हैं। किसी भी तारे के जीवन में एक ऐसा काल आता है जब तारे का समस्त हाइड्रोजन अथवा उसका नाभिकीय ईंधन समाप्त हो जाता है तो वह मृत्यु की ओर अग्रसर होता है अर्थात् सिकुड़ना आरंभ करता है। ऐसे में यदि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के 1.44 गुने तक (चन्द्रशेखर सीमा) है तो वह सिकुड़कर श्वेत वामन (White Dwarf) बन जाएगा और यदि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के 1.44 गुने से 2 गुने तक है तो वह न्यूट्रान तारा (Neutron Star) बन जाएगा और यदि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के दुगुने से अधिक है तो वह निरंतर सिकुड़ता चला जाएगा और अंततोगत्वा एक बिंदु के रूप में परिवर्तित हो जाएगा।

उसका घनत्व इतना प्रबल होता है, उसका गुरुत्व इतना प्रबल होता है कि उसमें से प्रकाश की किरणें भी नहीं निकल सकती है। तारों की यह परिणति कृष्ण विवर (Black Hole) कहलाती है। उसकी परिसीमा घटना क्षितिज कहलाती है। प्रो. हॉकिंग बताते हैं कि घटना क्षितिज से होकर कोई भी वस्तु या व्यक्ति असीम घनत्व के क्षेत्र में और साथ ही समय की समाप्ति में पहुंच जाएगा।

तारों के अवसान पर चंद्रशेखर का कार्य जग प्रसिद्ध है। हाकिंग ने डॉ. रोजर पेनरोज (ब्रिटिश भौतिकशास्त्री) के साथ मिलकर एक शोध पत्र तैयार किया जिसमें इस समस्या पर विचार किया गया कि आखिर उस समय क्या होता है जब विशालकाय तारों की चरम परिणति लैक होल के रूप में होती है।

आइंस्टाइन के सापेक्षवाद में भी कुछ ऐसा ही अनुमान लगाने की चेष्टा की गई थी। हॉकिंग ने निष्कर्ष दिया कि तारों का अवसान एक अत्यंत सघन बिंदु के रूप में आकर एकत्र होना चाहिए। इस बिंदु पर घनत्व असीम होग, जहां भौतिकी के सारे नियम समाप्त हो जाएगे !

हाकिंग ने ही सबसे पहली बार निष्कर्ष दिया था के black Hole पूरी तरह काले नहीं होते। इनमें काला इसलिए समझा गया कि अपने प्रबल गुरुत्वाकर्षण के नाते ये अपने चारों ओर की द्रव्यराशि को अपने में समाहित कर लेते हैं। हॉकिंग बिग-बैंग थियरी के प्रबल समर्थक रहे है। 1985 में अपनी पीएच-डी. थीसिस की तैयारी के दौरान उन्होंने ब्रिटिश भौतिकीषिद् डॉ. रोजर पेनरोज का एक आलेख पढ़ा जिसमें उन्होंने स्थापित किया था कि गुरुत्व के अधीन नक्षत्र अपने अवसानकाल में आकस्मिक रूप से शून्य आयतन और असीम घनत्व प्राप्त कर लेते हैं। भौतिकी में इस स्थिति को एकत्व (Singularly) कहते हैं। हॉकिंग ने इसी को अपने चिंतन का आधार बनाया। फिर 1970 में हॉकिंग और पेनरोज ने निष्कर्ष निकाला कि आइंस्टाइन के ‘सामान्य सापेक्षता सिद्धांत’ की मांग है कि ब्रह्मांड का आरंभ एकत्व में होना चाहिए जिसे आज बिग बैंग के रूप में जाना जाता है और जिसका अंत Black hole के रूप में होता है।

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