संघ व राज्य लोक सेवा आयोग की तैयारी कब और कैसे शुरू करें

आज युवाओं के लिए पहली प्राथमिकता होती है, अपनी राह में आ रहे कॅरियर के अवसरों में से सर्वश्रेष्ठ को तलाशना और वे हमेशा एक संतोषजनक कॅरियर की तलाश करते हैं जिससे अपने सपनों और इच्छाओं की पूर्ति हो सके. शिक्षित और महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए सिविल सेवा और राज्य सिविल सेवा शीर्ष कॅरियर है जिसे वे प्राप्त करने का लक्ष्य बनाते हैं. कुछ भाग्यशाली युवाओं के लिए, कॅरियर की शुरूआत में यह अवसर हाथ लग जाता है तो कई युवाओं के लिए यह एक समस्या का हिस्सा बन जाता है । असफलता क्यों हाथ लगती है ? क्या बड़े संस्थानों में पढ़ने से सफलता मिल ही जाती है  ! या हम सफलता प्राप्त करने की तरकीब से अपरिचित होते हैं । आओ जानते हैं, कहाँ गलतियाँ होती हैं, 

कई बार यह देखा गया है कि प्रारंभिक परीक्षा से लगभग एक वर्ष पहले तैयारी शुरू करने वाले उम्मीदवारों को इस परीक्षा की तैयारी संभालना आसान लगता है. हाल के बदलावों के बाद भी, गंभीर तैयारी करने के लिए यह न्यूनतम अवधि आवश्यक है. हालांकि, दीर्घकालिक योजना आदर्श रूप से 12 के बाद शुरू हो जानी चाहिए.

यह आपके स्वयं की क्षमता और स्थितियों के अनुरूप ढलने की स्थति पर भी निर्भर करता है , सफल उम्मीदवारों के कई उदाहरण ऐसे भी हैं, जिन्होंने प्रारंभिक परीक्षा में छह महीने पहले इस परीक्षा की तैयारी शुरू कर उच्च परिणाम दिए. आज सिविल सेवा परीक्षा सम्बन्धी सलाह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है क्योंकि विशेषज्ञों के अलावा बहुत से सफल उम्मीदवार अपने विचार और अनुभव साझा करते हैं जो भविष्य के उम्मीदवारों को तैयारी योजना बनाने के लिए कुछ सुराग लेने में मदद करते हैं. फिर भी ऐसी परीक्षाओं की सफलता के लिए अनुभवी मार्गदर्शकों की आवश्यकता होती है ।

फोकस अब सिविल सेवा परीक्षा 27 जून 2021 व 11अप्रैल 2012 की राज्य सेवा परीक्षा के लिए किया जाना चाहिए । इन परीक्षाओं के लिए गंभीर विद्यार्थियों को एकीकृत दृष्टिकोण अपनाते हुए मुख्य परीक्षा की और उन्मुख अध्ययन योजना के साथ परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए और इसके बारे में एक समग्र दृष्टिकोण होना चाहिए जो वास्तव में कार्यभार को प्रभावी ढंग से संभालने में मदद कर सके ।

सामान्य अध्ययन की तैयारी सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करती है और वास्तव में यह तैयारी रणनीति में उचित विचार के योग्य है भी. सामान्य अध्ययन के 4 प्रश्न-पत्रों को संभालने के लिए आपको बहुत कुछ पढ़ने की आवश्यकता है । यह आधारभूत ज्ञान को मजबूत करने, पारंपरिक भाग और गतिशील तत्वों के बीच संतुलन बनाए रखने और वैचारिक स्पष्टता के बारे में है जो इस परीक्षा की अप्रत्याशितता का सामना करने में मदद करता है. 

ये परीक्षाएँ आपकी स्मरण शक्ति, समझ की गहराई और समस्या का विश्लेषण करने की क्षमता तथा आपके बौद्धिक गुणों का मूल्यांकन करती है. सिविल सेवा के लिए जब वैकल्पिक विषय की बात आती है, तो आपकी पसंद बहुत मायने रखती है. उम्मीदवार तर्कसंगत सोच के साथ ‘एक’ वैकल्पिक विषय चुनना चाहिए ।

लेखन योग्यता है सफलता का औजार 

प्रतिवर्ष भारत सरकार  व राज्य शासन लगभग  विभिन्न पदों की रिक्तियां जारी करता है। संघ व राज्य लोक सेवा आयोग इन रिक्तियों पर भर्ती की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरा करता है। जिसमें- प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार आदि हैं। पहला चरण केवल प्रवेश परीक्षा है इसके नंबर आगे के चरणों में जोड़े नहीं जाते हैं। मुख्य परीक्षा आपके कैरियर  का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। यह चरण में है पेन व पेपर वाला मोड होता है । आपकी तैयारी का सबसे बड़ा मोड़ यही है । यहीं आपकी कुशलता, बुद्धि, ज्ञान, तथ्य ,मेमोरी  सभी का मूल्यांकन होगा।यदि आप अपनी तैयारी के दौरान  लिखने के अभ्यस्त नहीं हुए तोशमान लीजिए आपने तैयारी की ही नहीं । आप कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर बनेंगे या कोई छोटी पोस्ट पर चयन होगा… यह सब कुछ इसी लिखने से निर्धारित होगा ।

लिखते समय इन बातों का ध्यान रखें

  • सरल भाषा का इस्तेमाल करें।
  • अधिक लंबे वाक्यों का प्रयोग नहीं करें।
  • भाषा ऐसी हो जो समझी जा सके व अर्थपूर्ण हो।
  • गैर परंपरागत मुहावरों एवं कहावतों का प्रयोग न करें।

उत्तर लिखने के पूर्व ‘टेल वर्ड’ पर ध्यान दें

प्रश्न में टेल वर्ड दिये होते हैं, परीक्षार्थी बिना इस पर ध्यान दिए लिखना शुरू कर देता है, लिखने की सबसे बड़ी गलती यहीं से शुरू होती है । जैसे,व्याख्या, आलोचना, समीक्षा, विवेचन, चर्चा, विस्तार, परीक्षण, विश्लेषण व मूल्यांकन । जो पूछा गया है उसी के आधार पर उत्तर की शुरुआत और अंत होना चाहिए ।

परीक्षार्थियों को विचारक टी एस हक्सले की बात याद रखना चाहिए, “जीवन के आरंभ में मिलने वाली असफलताएं प्रायः सर्वाधिक लाभकारी सिद्ध होती हैं”  “विक्टर ह्यूगो कहते हैं, लोगों में बल की कमी नहीं है अपितु संकल्प शक्ति की कमी  है । याद रखें जहाज बन्दरगाह पर ज्यादा सुरक्षित होता है किन्तु वह उसका लक्ष्य नहीं है ।

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पहचाने मन की अद्भुत शक्ति को

सीबीएसई की परीक्षा तिथियाँ घोषित हो चुकी हैं, स्टूडेंट्स की धड़कने बढ़ने लगीं हैं, कोविड काल में पढ़ाई बहुत प्रभावित हुई है । पैरेंट्स व बच्चों दोनों को इस बात की चिंता है कि इस समय बच्चों की पढ़ाई व मन की स्थिति को कैसे संभाला जाय ! आज हम यहां कुछ उन बातों की चर्चा कर रहे हैं जो आपको इस विषम समय में न केवल संबल देंगी बल्कि आपको परीक्षा में सर्वोत्तम अंक लाने मे मददगार सिद्ध होंगी ।

स्टूडेंट्स की सबसे बड़ी समस्या होती है पढ़ाई में मन लगाना, जो आसान नहीं होता है । किन्तु जिसने इसे आसान बना लिया उसने ऊंचाई छू ली । विवेकानंद एकाग्रता को परिभाषित करते हुए कहते हैं, “जहाँ शरीर हो वहीं मन भी हो ” जब दोनो भिन्न-भिन्न जगह होते हैं, बस वहीं से समस्या शुरू होती है । जब आप पढ़ने बैठे उस समय आपको किताब के अलावा कुछ याद नहीं आना चाहिए । इसे करने में शुरुआत में कठिनाई होगी किन्तु कुछ एक सप्ताह के बाद यह करना सहज होने लगेगा ।

जब हम व्यर्थ की बातों को चित्त में आने देते हैं तो वे और मजबूत हो जाते हैं । इसलिए ऐसे विचारों को धीरे-धीरे बायकाट करो, जब इन्हें सम्मान नहीं मिलेगा तो ये आना बंद हो जाएंगे । किन्तु यह बिल्कुल नहीं भूलना हैं कि ऐसे विचारों की जगह आपको बहुत उपयोगी विचार अवश्य लाना है । उस जगह को खाली नहीं छोड़ना है ।

मन की चंचलता इसका स्वाभाविक गुण है जैसे हवा की प्रकृति बहना है, हवा बहेगी तो ही एहसास देगी । बस समस्या मन के अनियंत्रित होने से है, यदि इसकी लगाम आपके हाथ में है तो आप मालिक अन्यथा यह गुलाम बना कर आपकी स्थिति को बिगाड़ देगा ।

आपको पता नहीं है, जितना वफादार इस दुनिया में आपका मन है, उतना वफादार कोई भी नहीं है, क्योंकि उसके अंदर को शक्ति को पैदा करने वाला काम हम स्वयं करते है। जैसे आपने कुछ चाहा, अर्थात् सोचा, तो वह चीज आपके पास आने को आतुर हो जायेगी। कैसे आएगी, उसका रास्ता क्या होगा, कैसे होगा, इसे पहचानना आसान ….

योग का केन्द्र बिन्दु मन है ,यदि मन अच्छा है तो शरीर स्वाभाविक रूप अच्छा रहेगा । पतंजलि योग सूत्र में योग के लिए कहते हैं- ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ चित्त अर्थात् मन की चंचलता(वृत्ति) को धीमा करना,अति धीमा करना ही योग है ।  

उदाहरण के लिए हम शरीर को ही लें, यदि हमें कोई बीमारी है, तथा उस बीमारी की चर्चा आप बार-बार कर रहे हैं, तो आप ज़्यादा बीमार कोशिकाओं को पैदा कर रहे हैं। आप जैसे ही किसी बात की चर्चा करते हैं, आप उस बात को और अधिक अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यही चीज़ आपको और अधिक बीमार करती है। यदि यही चीज आप उल्टा कर दें, और यह कहना शुरु कर दे, कि मैं तो बिल्कुल

स्वस्थ हूँ, मुझे किसी तरह का कोई भी दर्द नहीं है, आप देखिए चमत्कार; पूरी प्रकृति आपको सपोर्ट करना शुरु कर देगी। कहने का मतलब जो आप नहीं चाहते और उसे आप

सोचते है, तो उसे आप ऊर्जा देते हैं। यदि उल्टा या पॉजीटिव सोचें तो यह बात अच्छी भी तो हो जायेगी। करना क्या, बस सोचना ही तो है तो क्यों ना सोचें। बहुत आसान है; करना ।

( लेखक लाईफ मैनेजमेंट कोच है, पिछले बीस वर्षों से सिविल सर्विसेज प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अध्यापन कार्य कर रहे हैं )

वफादार मन

आपको पता नहीं है, जितना वफादार इस दुनिया में आपका मन है, उतना वफादार कोई भी नहीं है, क्योंकि उसके अंदर को शक्ति को पैदा करने वाला काम हम स्वयं करते है। जैसे आपने कुछ चाहा, अर्थात् सोचा, तो वह चीज आपके पास आने को आतुर हो जायेगी। कैसे आएगी, उसका रास्ता क्या होगा, कैसे होगा, इसे पहचानना आसान ….

आपके अच्छे अच्छे एहसास, आपकी भावनाएँ, आपकी खुद की अपने प्रति मनोवृत्ति, आपकी खुद की ज़िन्दगी के रचनाकार होते हैं। लेकिन किसी को दूसरों को समझना आसान लगता है, खुद को समझना इतना मुश्किल क्यों? हमारे और आपके साथ वही सिद्धान्त पूर्णतया कार्य करता है कि भूत व भविष्य की सोच हमारे मन की शक्ति को पूर्णरूप से खाली कर देती है।

उदाहरण के लिए हम शरीर को ही लें, यदि हमें कोई बीमारी है, तथा उस बीमारी की चर्चा आप बार-बार कर रहे हैं, तो आप ज़्यादा बीमार कोशिकाओं को पैदा कर रहे हैं। हम सभी की ऐसी आदत है कि जैसे हमें बुखार भी हो जाए, तो हम उसे दूसरों को बताये बिना रह भी नहीं सकते। हमें लगता है कि उसे बताने पर हमें सहानुभूति मिल जायेगी। लेकिन ऐसी बात नहीं। आप जैसे ही किसी बात की चर्चा करते हैं, आप उस बात को और अधिक अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यही चीज़ आपको और अधिक बीमार करती है। यदि यही चीज आप उल्टा कर दें, और यह कहना शुरु कर दे, कि मैं तो बिल्कुल स्वस्थ हूँ, मुझे किसी तरह का कोई भी दर्द नहीं है, आप देखिए चमत्कार; पूरी प्रकृति आपको सपोर्ट करना शुरु कर देगी। कहने का मतलब जो आप नहीं चाहते और उसे आप

सोचते है, तो उसे आप ऊर्जा देते हैं। यदि उल्टा या पॉजीटिव सोचें तो यह बात अच्छी भी तो हो जायेगी। करना क्या, बस सोचना ही तो है तो क्यों ना सोचें। बहुत आसान है; करना है

मानो आप अपना क्रोध किसी चीज़ या किसी के विरोध में निकाल रहे हैं, तो आप उससे अपनी और नकारात्मक ऊर्जा को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कहने का भाव, प्रेम से प्रेम बढ़ता है, क्रोध से क्रोध बढ़ता है, इसलिए यदि हम अपने आप में शांत रहना शुरु कर दें, तो शांति भी तो बढ़ सकती है ना  इसलिए शांत रहें, शान्तिपन का माहौल भी पैदा करें। लोगों को बस प्यार करें।

सफल लोगों के लक्षण क्या हैं ?

सफल लोगों के लक्षण क्या हैं ?सफलता के लिए हम कुछ भी करने को तैयार रहते हैं परंतु इस पर हमने कभी विचार ही नहीं किया कि आखिर सफलता मिलती कब है और कैसे ? आज दुनिया में इस पर खूब लिखा गया ,खूब शोध हुए की आखिर सफल लोग करते क्या हैं  !!! 

प्रोफेसर वाल्टर के किए गए बहुत ही रोचक प्रयोग आपकी आंखें खोल देगा, यह बताता है कि सफल लोगों के लक्षण क्या होते हैं  !!

प्रबंधन की ट्रेट थ्योरी भी यह बताती हैं कि सफल व्यक्ति कुछ विशिष्ट गुण रखते हैं । यहां आप उस एक गुण को पढ़ पाएंगे,

टीचर ने क्लास के सभी बच्चों को एक खूबसूरत टॉफी दी और फिर एक अजीब बात कही… सुनो बच्चों, आप सभी कोदस मिनट तक अपनी टॉफी नहीं खानी है। और ये कहकर वो क्लास रूमसे बाहर चले गए। कुछ पल के लिए क्लास में सन्नाटा छा गया। हर बच्चा उसके सामनेपड़ी टॉफी को देख रहा था और हर गुज़रते पल के साथखुद को रोकना मुश्किल हो रहा था।

दस मिनट पूरे हुए और टीचरक्लास रूम में आ गए। समीक्षा की पूरे वर्ग में सात बच्चे थे जिनकी टॉफियां ज्यों की त्योंरखीं थीं।

जबकि बाकी के सभी बच्चे टॉफीखाकर उसके रंग और स्वाद पर टिप्पणी कर रहे थे। टीचर ने चुपके से इन सात बच्चों के नाम को अपनी डायरी में दर्ज़ कर दिए और नोट करने के बाद पढ़ाना शुरू कर दिया।

इस शिक्षक का नाम प्रोफसर वॉल्टर मशाल था। कुछ वर्षों के प्रोफेसर वॉटर ने अपनी बही डायरी खोली और सात बच्चों के नाम निकाल करउनके बारे में शोध शुरू कर दिया।

एक लम्बे संघर्ष केबाद उन्हें पता चला कि सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपने-अपने फील्ड के लोगों की संख्या में सबसे सफल हैं।

प्रोफेसर वॉल्टर ने अपने बाकी वर्ग के छात्रों की भी समीक्षा की और यह पता चला कि उनमें से ज़्यादातर एक आम जीवन जी रहे थे। जबकि कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें सख्त आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा था। इन सभी प्रयासों और शोध का परिणाम प्रोफेसर वॉल्टर ने एक वाक्य में निकाला और जो यह

था – “जो आदमी दस मिनट तक नहीं रख सकता, वह जीवन में कभी आम नही बढ़ सकता।” इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम “मार्श मेल यार” रखा गया, क्योंकि प्रोफेसर वॉल्टर ने बच्चों को जो टॉफी दी थी उसका नाम “मार्श मेलो” था। यह फोम की तरह नरम थी। इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ एक गुण धैर्य पाया जाता है। क्योंकि यह खूबी इंसान के बर्दाश्त की ताकत को बढ़ाती है जिसकी बदौलत आदमी कठिन परिस्थितियों में निराश नहीं होता और वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन जाता है।

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बड़ा सोचो…छोटा करो…लगातार करते रहो 

जिंदगी मौका हम सबको देती है  कि हम अपने आपको आजमाएं और सफलता तक पहुंचे। लेकिन इसके बावजूद बहुत कम लोग ही सफलता हासिल कर पाते हैं , सफलता के सही मायने भी समझना होंगे !   दरअसल जीवन में सफल होना उतना ही सरल है, जितना किसी बच्चे के लिए कोई नई स्किल सीखना। सफलता सरलता से आती है अर्थात यदि हम कुछ जरूरी अभ्यास व तरीकों को जिंदगी में शामिल कर लें तो किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते हैं जो सफलता हमारी भी जिंदगी का हमेशा के लिए पार्ट ऑफ लाइफ हो जाएगी । कबीर कहते हैं- करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान …।

कठोरता अपनाएं स्वयं के साथ

सफलता में सबसे बड़ी रुकावट हम खुद हैं। हम दूसरों के साथ कठोर होना वीरता मान लेते हैं किंतु जब स्वयं की बारी आती है तो अधिक से अधिक सरल रास्ते अपनाने की कोशिश करते हैं । यदि सफलता का स्वाद लेना है तो इसके लिए हमें कुछ जरूरी नियम बनाने ही होंगे। जैसे- सुबह जल्दी उठना, रोज शारीरिक कसरत व ध्यान करना, रोजाना कुछ पढ़ना व तय काम को तय समय सीमा में करना, समय का पाबंद रहना, लक्ष्य केन्द्रित रहना । ये सभी नियम छोटे जरूर प्रतीत होते हैं लेकिन अधिकांश लोग इन आदतों को अपनाने में ही विफल हो जाते
हैं। यदि हमें कुछ नया करना है, कुछ हासिल करना है तो यह करना ही होगा ।

निरतंरता रखे अपने प्रयासों में

बड़ा सोचो , छोटा करो , लगातार करते रहो । किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह नियम जरूरी है। हम सब लोग अपने नए काम या कुछ खास करने की बात करते हैं। उस पर काम करना शुरू भी कर देते हैं, लेकिन निरंतरता नहीं रख पाते। कारण या तो कुछ समय बाद हमारे विचार बदल जाना या अच्छे परिणाम नहीं आना, सही समय व वातावरण अनुकूल नहीं होना, कुछ भी हो सकता है । इन सबके बीच निरतंर संतुलन के साथ चलते रहना सफर को हमेशा के लिए सफल कर देता है । दुनिया में अपनी बड़ी सोच की दिशा में लगातार काम करने वाले बहुत कम है। इसीलिए सफल और श्रेष्ठ लोगों की संख्या भी कम है।

सहजता रखें सभी नतीजों में

एक अच्छी शुरुआत का मतलब यह नहीं है कि आप सफल हो गए। इसी तरह एक खराब शुरुआत का मतलब भी यह नहीं है कि आप विफल हो गए। यदि हम एक छोटे
बच्चे को कुछ नया करते हुए देखते हैं तो पाएंगे जब वह कोशिश करता है और परिणाम अच्छे नहीं आते या सफल नहीं होता तो वह रुकता नहीं, फिर कोशिश करता है। सफलता के साथ साथ खुश रहने के लिए सबसे जरूरी है कि हम प्रत्येक स्थिति में सहजता रखें। तीसरी शताब्दी के संत तिरुवल्लुवर कहते हैं, ” उत्साह मनुष्य की भाग्यशीलता का मापदंड है ” अर्थात काम में उत्साह बना रहना कार्य को पूर्णता तक पहुँचाने के लिए अतिआवश्यक है ।

परिणाम 

हम सभी परिणामों से गहराई से प्रभावित होते, बहुत स्वाभाविक भी है किन्तु यह भी ज्ञान होना ही चाहिए कि परिणाम हमेशा आपके अनुकूल नहीं हो सकते  ! ऐसी स्थिति में अब क्या करना है ? यदि यह जान लिया तब सफलता का टेस्ट हमेशा बरकरार रहेगा अन्यथा…सुशांत ।

*आइए अंत में सबसे रहस्यमयी और संजीवनी बूटी को जान लेते हैं, इसको समझने के लिए जीवन की व्यवस्था को समझना ही होगा…भगवान *श्रीकृष्ण गीता में उपदेश देते हुए कहते हैं* …

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है ।

इसी कर्म गति को समझते हुए परिणाम से प्रभावित हुए बिना सहज भाव से निरतंर कर्म करते रहें, परिणाम तो अवश्यंभावी मिलना ही है।भगवान कहते हैं उसे मैं टाल नहीं सकता ।
                  
                            –  रविन्द्र नरवरिया 
                  (लाइफ मैनेजमेंट कोच )

( www.examguider.com के ब्लॉग पर सभी लेख उपलब्ध )

चित्त वृत्ति निरोध:

योग

अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर सभी के लिए ईश्वर से प्रार्थना है कि आप स्वस्थ्य रहें खुश रहें । ईश्वर ने हमें इस संसार में खुश रहने के लिए प्रकृति और उसके अतिसुंदर,नायाब दृश्य दिए, विभिन्न फूल और फल दिए । ईश्वर हमेशा हमारी खुशी का ख्याल रखते हैं, मौसम में बदलाव लाकर हमारे मन को बोर होने से बचाते हैं ।

योग भी ईश्वर का नायाब तोहफा है, जिसे महर्षि पतंजलि के माध्यम हम तक पहुँचाया,  योग वास्तव में मन को ठीक करने का सुन्दर माध्यम है, यह केवल शरीर संचालन भर नहीं है, यह जिम की एक्सरसाइज़ बिल्कुल नहीं है ।

योग का केन्द्र बिन्दु मन है ,यदि मन अच्छा है तो शरीर स्वाभाविक रूप अच्छा रहेगा । पतंजलि योग सूत्र में योग के लिए कहते हैं- ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ चित्त अर्थात् मन की चंचलता(वृत्ति) को धीमा करना,अति धीमा करना ही योग है ।  क्योंकि मन की गति रूकेगी नहीं यदि ऐसा होता है तो गीता के अनुसार यह ‘state of mind’ की स्थिति होगी और ऐसी अवस्था में मस्तिष्क से बीटा किरणें  निकलती हैं । जहां मन में एक मिनट में विचारों की संख्या एक या बिल्कुल नहीं होती ।

इस समय अधिकांश मन की व्यथा से अधिक परेशान हैं, सुसाइड जैसी स्थिति इसी का एक परिणाम है । जब हम योग की अलग-अलग मुद्राओं को करते हैं तो हमारे शरीर से कई रसायनों का उत्सर्जन होता, कई ग्लेड्स को व्यायाम मिलता जिससे उनसे निकलने वाले हार्मोन्स आनुपातिक स्थिति में आ जाते हैं । इस आनुपातिक स्थिति से मन की व्यग्रता, उसकी उदासी और मन भटकने जैसी स्थितियाँ स्वतः ही कम या बहुत कम हो जाती हैं । शरीर में सब कुछ सही अनुपात होगा तो अस्वस्थता आएगी ही नहीं । आयुर्वेद भी कहता है- ‘वात-पित्त-कफ’ के अनुपात बिगड़ने पर ही हम अस्वस्थ होते हैं ।

इसलिए योग कीजिए मन से और मन के लिए.. ..स्वस्थ्य रहिए, खुश रहिए ।

– रविन्द्र नरवरिया, Life Management coach.