चित्त वृत्ति निरोध:

योग

अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर सभी के लिए ईश्वर से प्रार्थना है कि आप स्वस्थ्य रहें खुश रहें । ईश्वर ने हमें इस संसार में खुश रहने के लिए प्रकृति और उसके अतिसुंदर,नायाब दृश्य दिए, विभिन्न फूल और फल दिए । ईश्वर हमेशा हमारी खुशी का ख्याल रखते हैं, मौसम में बदलाव लाकर हमारे मन को बोर होने से बचाते हैं ।

योग भी ईश्वर का नायाब तोहफा है, जिसे महर्षि पतंजलि के माध्यम हम तक पहुँचाया,  योग वास्तव में मन को ठीक करने का सुन्दर माध्यम है, यह केवल शरीर संचालन भर नहीं है, यह जिम की एक्सरसाइज़ बिल्कुल नहीं है ।

योग का केन्द्र बिन्दु मन है ,यदि मन अच्छा है तो शरीर स्वाभाविक रूप अच्छा रहेगा । पतंजलि योग सूत्र में योग के लिए कहते हैं- ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ चित्त अर्थात् मन की चंचलता(वृत्ति) को धीमा करना,अति धीमा करना ही योग है ।  क्योंकि मन की गति रूकेगी नहीं यदि ऐसा होता है तो गीता के अनुसार यह ‘state of mind’ की स्थिति होगी और ऐसी अवस्था में मस्तिष्क से बीटा किरणें  निकलती हैं । जहां मन में एक मिनट में विचारों की संख्या एक या बिल्कुल नहीं होती ।

इस समय अधिकांश मन की व्यथा से अधिक परेशान हैं, सुसाइड जैसी स्थिति इसी का एक परिणाम है । जब हम योग की अलग-अलग मुद्राओं को करते हैं तो हमारे शरीर से कई रसायनों का उत्सर्जन होता, कई ग्लेड्स को व्यायाम मिलता जिससे उनसे निकलने वाले हार्मोन्स आनुपातिक स्थिति में आ जाते हैं । इस आनुपातिक स्थिति से मन की व्यग्रता, उसकी उदासी और मन भटकने जैसी स्थितियाँ स्वतः ही कम या बहुत कम हो जाती हैं । शरीर में सब कुछ सही अनुपात होगा तो अस्वस्थता आएगी ही नहीं । आयुर्वेद भी कहता है- ‘वात-पित्त-कफ’ के अनुपात बिगड़ने पर ही हम अस्वस्थ होते हैं ।

इसलिए योग कीजिए मन से और मन के लिए.. ..स्वस्थ्य रहिए, खुश रहिए ।

– रविन्द्र नरवरिया, Life Management coach.