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असम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर – Exam Guider

असम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर

असम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(Nationl register of citizens)

असम देश का पहला राज्य है जहां वर्ष 1951 में नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर प्रकाशित किया गया था और अब सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों एवं निर्धारित समय-सीमा के तहत इसे संशोधित कर अंतिम रूप दिया जा रहा है। संशोधित नागरिक रजिस्टर का अंतिम रूप को 31 जुलाई, 2019 तक ही प्रकाशित होना था किंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाशन तिथि को बढ़ाकर 31 अगस्त, 2019 कर दिया है। संशोधित नागरिक रजिस्टर का प्रथम प्रारूप 31 दिसंबर, 2017 को प्रकाशित हुआ था। 3.29 करोड़ आवेदकों में 1.9 करोड़ लोगों का नाम शामिल कर उन्हें वैध भारतीय नागरिक माना गया था। इसका अंतिम प्रारूप 30 जुलाई, 2018 को प्रकाशित किया गया जिसमें 28,983,677 लोगों के नाम शामिल थे जबकि 4,007,707 लोग खुद को वैध भारतीय नागरिक सिद्ध करने में असफल रहे।

क्या है असम का ‘नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर’?

‘नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर'(NRC) असम में रह रहे वैध भारतीय नागरिकों की सूची है। देश में 1951 की जनगणना के बाद असम मे इस तरह का पहला रजिस्टर वर्ष 1951 में तैयार किया गया था अब इस रजिस्टर को फिर से अद्यतन कर प्रकाशित किया जा रहा है।

पृष्ठभूमि

असम में नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें 192 वर्ष पीछे जाना पड़ेगा। दरअसल 2 फरवरी, 1826 को यांदाबो की संधि के द्वारा बर्मा ने असम पर से अपना संप्रभूता समाप्त कर इसे ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया। इससे वह 13वीं शताब्दी से जारी अहोम शासन का भी अंत हो गया| ब्रिटिश सरकार ने असम का अधिग्रहण कर इसे बंगाल प्रांत की एक प्रशासनिक इकाई बना दिया। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के समय असम धारा 46(1) के तहत गवर्नर प्रांत के तहत था। वर्ष 1946 में ‘फॉरेनर्स एक्ट’ जब अधिनियमित किया गया तब यह प्रावधान किया गया कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं, उसे सिद्ध करने की जवाबदेही उस व्यक्ति की होगी। भारतीय संविधान की धारा 5 में भी यह प्रावधान किया गया कि भारतीय क्षेत्र में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति या जिसका अभिभावक भारत में जन्मा हो, भारत का नागरिक होगा। जहां तक स्वतंत्रता के पश्चात पाकिस्तान से भारत में आए लोगों की बात थी तो उसके लिए संविधान की धारा 6 में प्रावधान कर भारतीय नागरिकता के लिए 19 जुलाई, 1948 को बेसलाइन माना गया। इस तिथि से पूर्व पाकिस्तान से भारत में प्रवास कर गये लोगों को भारतीय नागरिक माना गया। वहीं इस तिथि के पश्चात भारत में आए पाकिस्तानी प्रवासियों को संविधान लागू होने से पूर्व आवेदन करने पर नागरिकता प्रदान की जाती बशर्ते कि वह आवेदन से छह माह पूर्व से भारत में रह रहा हो।

इसी बीच असम के स्थायी निवासियों के संरक्षण के लिए ‘प्रवासी (असम से निष्कासन) एक्ट, 1950 (Immigrants (Expulsion from Assam) Act, 1950) अधिनियमित किया गया। इस एक्ट के लाने के उद्देश्यों के बारे में कहा गया कि ‘ विगत कुछ महीनों में पूर्वी पाकिस्तान के निवासियों के असम में आने से गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। इतने बड़े स्तर पर प्रवासन से कानून एवं व्यवस्था की गंभीर समस्या के अलावा प्रांत की अर्थव्यवस्था में व्यवधान आ रहा है’। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक्ट की धारा 2 एवं 4 में वैसे लोगों को भारत या असम से हटाने के लिए केंद्र सरकार को कहा गया जो भारत का निवासी नहीं हो और इनसे भारत के आम लोगों या असम के अनुसूचित जनजातियों के हितों को खतरा हो। इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर वर्ष 1951 की जनगणना के दौरान असम के लिए नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार किया गया।

प्रवासियों एवं घूसपैठियों की संख्याः

वैसे असम में पूर्वी दिशा से प्रवासी पहले से आते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर बारपेटा सबडिविजन में मुस्लिम आबादी वर्ष 1911 के 0.1 प्रतिशत से बढ़कर 1941 में 49 प्रतिशत हो गई (1) भारत की आजादी के समय हुयी हिंसा के पश्चात भी बड़ी संख्या में लोग पूर्वी पाकिस्तान से असम की ओर प्रवास कर गए। अंतर केवल इतना था कि जहां विभाजन से पूर्व लोग रोजगार व बेहतर जीवन के लिए प्रवास किए थे वहीं आजादी के समय आने वाले लोग हिंदू शरणार्थी भी थे। वैसे असम में विभाजन के पश्चात भी बड़ी संख्या में घूसपैठिए आते रहे हैं। वर्ष 1963 में भारत के महापंजीयक की एक रिपोर्ट के अनुसार असम में घूसपैठियों की संख्या 2,20691 थी। वर्ष 1951 से 1961, 1961 से 1971 तथा 1971 से 1981 के बीच जहां भारत में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर 21 से 25 प्रतिशत के बीच रही है वहीं असम में यह वृद्धि दर 35 से 36 प्रतिशत के बीच रही है। वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के पश्चात भारत में अनुमानतः एक करोड़ बांग्लादेशी आ गए थे (1)। उपर्युक्त संख्या विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि 1948 से लेकर 1972 तक असम में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घूसपैठ किए।

समस्या का जन्म व आंदोलन:

असम में बड़े पैमाने पर आए बांग्लादेशियों को देखते हुए ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) ने 1980 में प्रधानमंत्री को मेमोरंडम सौंपा। तदनुसार, संसद् ने ‘अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983’ (Ilegal Migrants (Determination by Tribunal) Act, 1983) a ae।जो केवल असम में ही लागू किया गया। हालाँकि, यह एक्ट असम में घूसपैठियों को बाहर करने के लिए लड़ रहे आंदोलनकारियों को शांत करने में विफल रहा। इनका तर्क था कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा-3 के तहत जारी विदेशी (ट्रिब्यूनल) आदेश 1964, जो कि संपूर्ण।भारत में लागू है, में भारतीय नागरिक सिद्ध करने की जिम्मेदारी संदिग्ध विदेशियों पर थी, तो 1983 के एक्ट के तहत असम में यह जिम्मेदारी पुलिस को सौंपी गई थी। आंदोलनकारियों का यह भी तर्क था कि यह एक्ट केवल 1971 के पश्चात असम में घूसपैठ कर गए विदेशियों पर ही लागू होता था। फलत: इस एक्ट के विरोध में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुआ जिसके पश्चात 15 अगस्त, 1985 को एएएसयू, केंद्र सरकार और असम राज्य के बीच असम समझौता (Assam Accord) पर हस्ताक्षर किए गए। असम एकॉर्ड की धारा-5 विदेशी मुद्दा से संबंधित है, जिसमें अन्य बातों के अलावा, 25 मार्च, 1971 या उसके बाद असम आने वाले विदेशियों का पता लगाने, हटाने और निष्कासित करने की प्रक्रिया जारी रखने की व्यवस्था थी। इस एकॉर्ड के आलोक में नागरिकता अधिनियम में 1985 में सेक्शन- 6ए जोड़ा गया। सेक्शन-6ए (1) बी के अनुसार विदेशियों को फॉरेनर्स एक्ट, 1946 तथा फॉरेनर्स (ट्रिब्यूनल्स) आदेश, 1964 के तहत स्थापित ट्रिब्यूनल के तहत पहचाने जाने थे। असम एकॉर्ड से कुछ हद तक तनाव जरूर कम हुए परंतु इससे भी मसला पूरी तरह हल नहीं हुआ क्योंकि इसमें 25 मार्च, 1971 से पहले आए विदेशियों को शरणार्थी फिर 10 साल पश्चात भारतीय नागरिक बनाया जाना था ।

1998 में तत्कालीन उप-राज्यपाल एस. के.सिंह ने इस संबंध में भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर असम में अवैध प्रवासियों की आयी बाढ़ पर चिंता जाहिर की। दूसरी ओर सर्बानंद सोनोवाल ने वर्ष 2000 में सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर वर्ष 1983 के अवैध प्रवासी एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। सर्वोच्च।न्यायालय ने वर्ष 2005 में 1983 के एक्ट को रद्द कर दिया। परंतु केंद्र सरकार ने 2006 में फॉरेनर्स (असम के लिए ट्रिब्यूनल्स) आदेश जारी कर दिया जो 1983 के एक्ट अनुरूप ही था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को भी निरस्त कर दिया।

इसी बीच वर्ष 2005 में केंद्र सरकार, असम सरकार एवं ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (एएएसयू) के बीच त्रिपक्षीय वार्ता हुयी जिसमें एनआरसी(NRC) को अद्यतन करने पर सहमति बनी और इस तरह प्रक्रिया की दिशा में कदम रखा गया। असम के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अद्यतन करने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट जून 2010 में कामरूप और बारपेटा जिलों में आरंभ भी की गई। परंतु बारपेटा में स्थिति हिंसक हो जाने के बाद इसे रोक दिया गया। इस बीच, असम लोक निर्माण-एक गैर सरकारी संगठन, ने मतदाता सूची से अवैध प्रवासियों के नाम को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एनआरसी को अपडेट करना शुरू करने का निर्देश दिया और इसे जनवरी 2016 के अंत तक प्रकाशित करने भी आदेश दिया। एनआरसी को सर्वोच्च न्यायालय के इसी आदेश व निगरानी में अद्यतन किया जा रहा है।

एनआरसी में नाम शामिल करने का तरीका एनआरसी अद्यतन करते समय उन व्यक्तियों के नाम, सूची में दर्ज किए जा रहे हैं जिनका नाम 1951 की प्रथम एनआरसी में है या फिर 24 मार्च, 1971 की आधी रात तक किसी भी मतदाता सूची में नाम प्रकाशित हुआ है या फिर 24 मार्च, 1971 की मध्य रात्रि तक जारी कोई भी स्वीकार्य दस्तावेज में नाम है। प्रथम दोनों डेटा को ‘विरासतीय डेटा’ (Legacy Data) नाम दिया गया है। इस तरह प्रभावी रूप से, केवल वही व्यक्ति एनआरसी(NRC) में अपना नाम दर्ज करा पाएंगे जिनका नाम 25 मार्च, 1971 से पहले मौजूद मतदाता सूची या एनआरसी में हो या इन सूचियों में दर्ज नाम के साथ व्यक्ति अपना संबंध स्थापित कर पाता हो। चूंकि ये डेटा काफी पुराने हैं और लोग किसी अन्य हिस्से में भी जाकर बस गए होंगे इसलिए लोगों की सुविधा के लिए असम सरकार द्वारा ‘डिजिटाइज्ड लीगैसी डेटा डेवलपमेंट’ (Digitized Legacy Data Development: DLDD) भी तैयार किया गया है।

क्या होगा अवैध प्रवासियों का ?

वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि कोई विदेशी नागरिक भारत में अवैध रूप से रहते हुए पाया जाता है, तो पुलिस उस व्यक्ति को पासपोर्ट अधिनियम. 1920 या फॉरेनर्स एक्ट, 1946 के तहत स्थानीय अदालत में पेश करती है। न्यायालय उसे 3 महीने से 8 साल की जेल की सजा देती है। जेल की सजा पूरी होने के पश्चात उस व्यक्ति को अपने देश में निर्वासित करने की अनुमति दी जाती है। इस बीच उसे बंदी केंद्र (Detention centre) में भेज दिया जाता है और वहां तब तक रहता है जब तक कि मूल देश उसे स्वीकार नहीं करता। असम में अभी सात बंदी केंद्र कार्य रहे हैं। फॉरेनर्स एक्ट 1946 की धारा 3(2) (सी) के तहत किसी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने का अधिकार केंद्र सरकार में निहित है। संविधान के अनुच्छेद 258(1 ) के तहत राज्य सरकारों को तथा अनुच्छेद 239(1) के तहत संघ शासित प्रदेशों को भी यह अधिकार सौपा गया है। इस अधिनियम में मई 2019 में संशोधन किया गया था जिसके तहत जिला मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया गया है कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं इसे निर्धारण करने के लिए वह न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) की स्थापना कर सके। चूंकि नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर केवल असम में तैयार किया जा रहा है, इसलिए 30 मई, 2019 का आदेश केवल असम में लागू होता है। यही कारण है। कि विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) जो कि एक अर्ध न्यायिक निकाय है, केवल असम में स्थापित किए गए हैं। असम में तैयार हो रहे नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर के मद्देनजर, केंद्रीय गृह मंत्रालय 1000 अतिरिक्त फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल स्थापित करने की घोषणा की है। पहले से ही 100 ऐसे ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं।

एक बार जब कोई व्यक्ति अंतिम एनआरसी में अपना नाम दर्ज कराने में विफल रहता है, तो संशोधित विदेशी (ट्रिब्यूनल) आदेश, 2019 के तहत फॉरेनर्स ट्रिब्यूनलों के समक्ष वह इसके खिलाफ चुनौती दे सकता है। दूसरी ओर नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 में भी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। इस विधेयक के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं श्रीलंका से आए हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध एवं पारसी को भारतीय नागरिकता प्रदान किया जा सकता है। लोकसभा ने 8 जनवरी, 2019 को यह विधेयक पारित कर दिया था परंतु लोकसभा के भंग हो जाने के कारण विधेयक राज्यसभा से पारित नहीं हो सका। अब चूंकि एनडीए राज्यसभा में कई विधेयक पारित करवा पाने में सफल हो गई है, ऐसे में यह विधेयक भी फिर

से पेश किया जा सकता है। विधेयक के कानून बनने से बांग्लादेश से बड़ी संख्या में आए गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जा सकती है। इस तरह अंतिम एनआरसी से बाहर होने के बावजूद, भी कई विकल्प उपलब्ध हैं। हालांकि, एक सवाल अनुत्तरित है, और वह यह कि क्या एनआरसी से बाहर किए गए लोग, जब अपने सारे विकल्प इस्तेमाल करने के बावजूद भारत में ‘अवैध रूप से रह रहे’ सिद्ध हो जाते हैं, तो क्या उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाएगा? क्या यह इतना मे आसान होगा, खासकर उन लोगों के लिए जो विगत 40 से अधिक

वर्षों से असम में रह रहे हैं? हालांकि इससे पहले कुछ पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नागरिकों को उनके संबंधित देशों में भारत से जरूर वापस भेज दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद् में दिए गए डेटा के अनुसार लगभग 330 पाकिस्तानी और 1770 बांग्लादेशी नागरिकों को 2016 से 2018 के चीच वापस कर दिया गया है। परंतु यह तो छोटी संख्या है जो उतना मुश्किल नहीं रहा है। एनआरसी के द्वारा अवैध करार दिए गए लाखों प्रवासियों को निर्वासित करना आसान नहीं होने वाला है, खासकर तब जब बांग्लादेश पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। बांग्लादेश घोषणा कर चुका है कि भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश की प्रधान मंत्री शेख हसीना को व्यक्तिगत रूप से आश्वासन दिया है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर किए गए लोगों को बांग्लादेश नहीं भेजा जाएगा। समस्या कार्यान्वयन के स्तर पर भी हैं। चूंकि बहिष्कृत व्यक्ति जमीन या मकान खरीदने का हकदार नहीं होगा, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार लोगों को उनके नाम पर पंजीकृत घरों और जमीनों को खाली करने के लिए कैसे मजबूर करेगी। भले ही सरकार इन लोगों को उनके घरों या ज़मीनों से जबरदस्ती खाली कर दे, लेकिन कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।

एनआरसी(NRC) : कब-कैसे

1935: भारत सरकार अधिनियम लागू होने के समय, असम धारा 46 (1) -ए के तहत गवर्नर प्रांत के अधीन था.

1946: फॉरेनर्स एक्ट लागू हुआ

1948: भारत के संविधान के अनुच्छेद 6 के तहत भारत के नागरिक होने के लिए 19 जुलाई, 1948 आधार तिथि के रूप में निर्धारित

1950: अप्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम, 1950 असम के मूल निवासियों की रक्षा के लिए लागू किया गया

1951: गृह मंत्रालय के एक निर्देश के तहत नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार किया गया

1971: पूर्वी पाकिस्तान के खिलाफ पश्चिम पाकिस्तान की शत्रुता 25 मार्च को युद्ध के साथ समाप्त हुई।

1983: अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 को संसद द्वारा अधिनियमित किया गया

1985: 15 अगस्त को कंद्र और राज्य सरकार तथा ऑल असम स्टूडेंट यूनियन तथा एएजीएसपी के बीच असम एकॉर्ड पर हस्ताक्षर किए गए।

1985: असम एकॉर्ड के अनुसरण में, नागरिकता अधिनियम में धारा 6 ए सम्मिलित की गई।

2000: सर्बानंद सोनोवाल (वर्तमान मुख्यमंत्री) ने अवैध प्रवासियों (न्यायाधिकरणों द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिका दायर की

2004: गृह राज्य मंत्री ने संसद में कहा कि 31. दिसंबर,

2001 तक भारत में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की अनुमानित संख्या 12 मिलियन थी, जिसमें से 5 मिलियन असम में थे।

2005: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 1983 का एक्ट भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।

2012-14: असम में बड़े पैमाने पर दंगे हुए, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।

2017: 31 दिसंबर को एनआरसी का पहला मसौदा प्रकाशित हुआ

2018: एनआरसी का अंतिम मसौदा प्रकाशित

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