सफल लोगों के लक्षण क्या हैं ?

सफल लोगों के लक्षण क्या हैं ?

सफलता के लिए हम कुछ भी करने को तैयार रहते हैं परंतु इस पर हमने कभी विचार ही नहीं किया कि आखिर सफलता मिलती कब है और कैसे ? आज दुनिया में इस पर खूब लिखा गया ,खूब शोध हुए की आखिर सफल लोग करते क्या हैं  !!! 

प्रोफेसर वाल्टर के किए गए बहुत ही रोचक प्रयोग आपकी आंखें खोल देगा, यह बताता है कि सफल लोगों के लक्षण क्या होते हैं  !!

प्रबंधन की ट्रेट थ्योरी भी यह बताती हैं कि सफल व्यक्ति कुछ विशिष्ट गुण रखते हैं । यहां आप उस एक गुण को पढ़ पाएंगे,

टीचर ने क्लास के सभी बच्चों को एक खूबसूरत टॉफी दी और फिर एक अजीब बात कही… सुनो बच्चों, आप सभी कोदस मिनट तक अपनी टॉफी नहीं खानी है। और ये कहकर वो क्लास रूमसे बाहर चले गए। कुछ पल के लिए क्लास में सन्नाटा छा गया। हर बच्चा उसके सामनेपड़ी टॉफी को देख रहा था और हर गुज़रते पल के साथखुद को रोकना मुश्किल हो रहा था।

दस मिनट पूरे हुए और टीचरक्लास रूम में आ गए। समीक्षा की पूरे वर्ग में सात बच्चे थे जिनकी टॉफियां ज्यों की त्योंरखीं थीं।

जबकि बाकी के सभी बच्चे टॉफीखाकर उसके रंग और स्वाद पर टिप्पणी कर रहे थे। टीचर ने चुपके से इन सात बच्चों के नाम को अपनी डायरी में दर्ज़ कर दिए और नोट करने के बाद पढ़ाना शुरू कर दिया।

इस शिक्षक का नाम प्रोफसर वॉल्टर मशाल था। कुछ वर्षों के प्रोफेसर वॉटर ने अपनी बही डायरी खोली और सात बच्चों के नाम निकाल करउनके बारे में शोध शुरू कर दिया।

एक लम्बे संघर्ष केबाद उन्हें पता चला कि सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपने-अपने फील्ड के लोगों की संख्या में सबसे सफल हैं।

प्रोफेसर वॉल्टर ने अपने बाकी वर्ग के छात्रों की भी समीक्षा की और यह पता चला कि उनमें से ज़्यादातर एक आम जीवन जी रहे थे। जबकि कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें सख्त आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा था। इन सभी प्रयासों और शोध का परिणाम प्रोफेसर वॉल्टर ने एक वाक्य में निकाला और जो यह

था – “जो आदमी दस मिनट तक नहीं रख सकता, वह जीवन में कभी आम नही बढ़ सकता।” इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम “मार्श मेल यार” रखा गया, क्योंकि प्रोफेसर वॉल्टर ने बच्चों को जो टॉफी दी थी उसका नाम “मार्श मेलो” था। यह फोम की तरह नरम थी। इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ एक गुण धैर्य पाया जाता है। क्योंकि यह खूबी इंसान के बर्दाश्त की ताकत को बढ़ाती है जिसकी बदौलत आदमी कठिन परिस्थितियों में निराश नहीं होता और वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन जाता है।

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बड़ा सोचो…छोटा करो…लगातार करते रहो 

जिंदगी मौका हम सबको देती है  कि हम अपने आपको आजमाएं और सफलता तक पहुंचे। लेकिन इसके बावजूद बहुत कम लोग ही सफलता हासिल कर पाते हैं , सफलता के सही मायने भी समझना होंगे !   दरअसल जीवन में सफल होना उतना ही सरल है, जितना किसी बच्चे के लिए कोई नई स्किल सीखना। सफलता सरलता से आती है अर्थात यदि हम कुछ जरूरी अभ्यास व तरीकों को जिंदगी में शामिल कर लें तो किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते हैं जो सफलता हमारी भी जिंदगी का हमेशा के लिए पार्ट ऑफ लाइफ हो जाएगी । कबीर कहते हैं- करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान …।

कठोरता अपनाएं स्वयं के साथ

सफलता में सबसे बड़ी रुकावट हम खुद हैं। हम दूसरों के साथ कठोर होना वीरता मान लेते हैं किंतु जब स्वयं की बारी आती है तो अधिक से अधिक सरल रास्ते अपनाने की कोशिश करते हैं । यदि सफलता का स्वाद लेना है तो इसके लिए हमें कुछ जरूरी नियम बनाने ही होंगे। जैसे- सुबह जल्दी उठना, रोज शारीरिक कसरत व ध्यान करना, रोजाना कुछ पढ़ना व तय काम को तय समय सीमा में करना, समय का पाबंद रहना, लक्ष्य केन्द्रित रहना । ये सभी नियम छोटे जरूर प्रतीत होते हैं लेकिन अधिकांश लोग इन आदतों को अपनाने में ही विफल हो जाते
हैं। यदि हमें कुछ नया करना है, कुछ हासिल करना है तो यह करना ही होगा ।

निरतंरता रखे अपने प्रयासों में

बड़ा सोचो , छोटा करो , लगातार करते रहो । किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह नियम जरूरी है। हम सब लोग अपने नए काम या कुछ खास करने की बात करते हैं। उस पर काम करना शुरू भी कर देते हैं, लेकिन निरंतरता नहीं रख पाते। कारण या तो कुछ समय बाद हमारे विचार बदल जाना या अच्छे परिणाम नहीं आना, सही समय व वातावरण अनुकूल नहीं होना, कुछ भी हो सकता है । इन सबके बीच निरतंर संतुलन के साथ चलते रहना सफर को हमेशा के लिए सफल कर देता है । दुनिया में अपनी बड़ी सोच की दिशा में लगातार काम करने वाले बहुत कम है। इसीलिए सफल और श्रेष्ठ लोगों की संख्या भी कम है।

सहजता रखें सभी नतीजों में

एक अच्छी शुरुआत का मतलब यह नहीं है कि आप सफल हो गए। इसी तरह एक खराब शुरुआत का मतलब भी यह नहीं है कि आप विफल हो गए। यदि हम एक छोटे
बच्चे को कुछ नया करते हुए देखते हैं तो पाएंगे जब वह कोशिश करता है और परिणाम अच्छे नहीं आते या सफल नहीं होता तो वह रुकता नहीं, फिर कोशिश करता है। सफलता के साथ साथ खुश रहने के लिए सबसे जरूरी है कि हम प्रत्येक स्थिति में सहजता रखें। तीसरी शताब्दी के संत तिरुवल्लुवर कहते हैं, ” उत्साह मनुष्य की भाग्यशीलता का मापदंड है ” अर्थात काम में उत्साह बना रहना कार्य को पूर्णता तक पहुँचाने के लिए अतिआवश्यक है ।

परिणाम 

हम सभी परिणामों से गहराई से प्रभावित होते, बहुत स्वाभाविक भी है किन्तु यह भी ज्ञान होना ही चाहिए कि परिणाम हमेशा आपके अनुकूल नहीं हो सकते  ! ऐसी स्थिति में अब क्या करना है ? यदि यह जान लिया तब सफलता का टेस्ट हमेशा बरकरार रहेगा अन्यथा…सुशांत ।

*आइए अंत में सबसे रहस्यमयी और संजीवनी बूटी को जान लेते हैं, इसको समझने के लिए जीवन की व्यवस्था को समझना ही होगा…भगवान *श्रीकृष्ण गीता में उपदेश देते हुए कहते हैं* …

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है ।

इसी कर्म गति को समझते हुए परिणाम से प्रभावित हुए बिना सहज भाव से निरतंर कर्म करते रहें, परिणाम तो अवश्यंभावी मिलना ही है।भगवान कहते हैं उसे मैं टाल नहीं सकता ।
                  
                            –  रविन्द्र नरवरिया 
                  (लाइफ मैनेजमेंट कोच )

( www.examguider.com के ब्लॉग पर सभी लेख उपलब्ध )

चित्त वृत्ति निरोध:

योग

अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर सभी के लिए ईश्वर से प्रार्थना है कि आप स्वस्थ्य रहें खुश रहें । ईश्वर ने हमें इस संसार में खुश रहने के लिए प्रकृति और उसके अतिसुंदर,नायाब दृश्य दिए, विभिन्न फूल और फल दिए । ईश्वर हमेशा हमारी खुशी का ख्याल रखते हैं, मौसम में बदलाव लाकर हमारे मन को बोर होने से बचाते हैं ।

योग भी ईश्वर का नायाब तोहफा है, जिसे महर्षि पतंजलि के माध्यम हम तक पहुँचाया,  योग वास्तव में मन को ठीक करने का सुन्दर माध्यम है, यह केवल शरीर संचालन भर नहीं है, यह जिम की एक्सरसाइज़ बिल्कुल नहीं है ।

योग का केन्द्र बिन्दु मन है ,यदि मन अच्छा है तो शरीर स्वाभाविक रूप अच्छा रहेगा । पतंजलि योग सूत्र में योग के लिए कहते हैं- ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ चित्त अर्थात् मन की चंचलता(वृत्ति) को धीमा करना,अति धीमा करना ही योग है ।  क्योंकि मन की गति रूकेगी नहीं यदि ऐसा होता है तो गीता के अनुसार यह ‘state of mind’ की स्थिति होगी और ऐसी अवस्था में मस्तिष्क से बीटा किरणें  निकलती हैं । जहां मन में एक मिनट में विचारों की संख्या एक या बिल्कुल नहीं होती ।

इस समय अधिकांश मन की व्यथा से अधिक परेशान हैं, सुसाइड जैसी स्थिति इसी का एक परिणाम है । जब हम योग की अलग-अलग मुद्राओं को करते हैं तो हमारे शरीर से कई रसायनों का उत्सर्जन होता, कई ग्लेड्स को व्यायाम मिलता जिससे उनसे निकलने वाले हार्मोन्स आनुपातिक स्थिति में आ जाते हैं । इस आनुपातिक स्थिति से मन की व्यग्रता, उसकी उदासी और मन भटकने जैसी स्थितियाँ स्वतः ही कम या बहुत कम हो जाती हैं । शरीर में सब कुछ सही अनुपात होगा तो अस्वस्थता आएगी ही नहीं । आयुर्वेद भी कहता है- ‘वात-पित्त-कफ’ के अनुपात बिगड़ने पर ही हम अस्वस्थ होते हैं ।

इसलिए योग कीजिए मन से और मन के लिए.. ..स्वस्थ्य रहिए, खुश रहिए ।

– रविन्द्र नरवरिया, Life Management coach.